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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

श्रीविट्ठलदासजी) (६१
धनुष बान सौं प्रीति, स्वामि के आयुध प्यारे।
निकट निरन्तर रहत, होत कबहुँ नहिं न्यारे॥
सूरवीर हनुमत् सदृश, परम उपासक प्रेम भर।
रामदास परताप तैं खेम गुसाईं खेमकर॥ ८३॥
श्रीविट्ठलदासजी
विट्ठलदास माथुर मुकुट, भयौ अमानी मानदा॥
तिलक दाम सौं प्रीति, गुनहिं गुन अन्तर धार्यौ।
भक्तन को उत्कर्ष, जनम भरि रसन उच्चार्यौ॥
सरल हृदै सन्तोष, जहाँ तहँ पर उपकारी।
उत्सव में सुत दान, कर्म कियो दुसकर भारी॥
हरि गोविन्द जै-जै गोविन्द गिरा सदा आनन्ददा।
विट्ठलदास माथुर मुकुट भयौ अमानी मानदा॥ ८४॥
भाई उभै माथुर सु राना के पुरोहित हे, लरि मरे आपस में जियो एक जाम है।
ताको सुत विट्ठल सु दास सुखरासि हिये, लिये वैस थोरी भयौ बड़ौ सेवै श्याम है॥
बोल्यौ नृप सभा मध्य 'आवत विप्र सुत, छिप लै कै आवौ' कही कह्यौ 'पूजै काम है'।
फेरिकै बुलायौ 'करौ जागरन याही ठौर' काहू समझायौ 'गावै नाचै प्रेमधाम है'॥ ३४८॥
गये संग साधुनि लै बिनै रंग रँगे सब, राना उठि आदर दै नीके पधराये हैं।
किये जा बिछौना तीनि छतनि के ऊपर लै, नाचि गाय आये प्रेम गिरे नीचे आये हैं॥
राजा मुख भयौ सेत दुष्टनि कौं गारी देत, सन्त भरि अंक लेत घर मधि ल्याये है।
भूप बहु भेंट करी देह वाही भाँति परी, पाछे सुधि भई दिन तीसरे जगाये है॥ ३४६॥
उठे जब माय ने जनाय सब बात कही, सही नहीं जात निसि निकसे विचारिकै।
आये यों छटीकरा में गरुड़ गोविन्द सेवा, करत मगन हिये रहत निहारिकै॥
राजा के जे लोग सु तौ ढूँढ़ि करि रहे बैठि, तिया मात आई करें रुदन पुकारिकै।
किये लै उपाय रही कितौ हा-हा खाय ये तौ, रहे मँडराय तब बसी मन हारिकै॥ ३५०॥