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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

प्राक्कथन
त्रिकशासन के अनुसार शिवसूत्र आगम शास्त्र का बहुत ही आवश्यक अंग है।
द्वैतदर्शन से अधिवासित इस जीवलोक में अद्वैत-दर्शन के रहस्यसम्प्रदाय का विच्छेद
न होने अपितु इसका पुनरुत्थान करने के लिए ही इन सूत्रों का आविर्भाव हुआ था।
भगवान् शिव से प्रेरित भट्ट कल्लट के गुरु आचार्य वसुगुप्त द्वारा इन सूत्रों का प्रचार
ईसा की आठवीं-नौवीं शताब्दी में कश्मीर में हुआ। इस अद्वैत शास्त्र की महत्ता को
जानकर ही इस पर 'विमर्शिनी' नाम की संस्कृत टीका के लेखक क्षेमराज ने इसे
'शिवोपनिषत्-संग्रह' का नाम दिया था।
यद्यपि 'शिवसूत्र' के यह ७७ सूत्र शैवागम के अनुसार तीन उपायों में बाँटे गए हैं
तथापि भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप श्रीस्वामी लक्ष्मण जू के आशीर्वादात्मक आमुख के
अनुसार 'साधक जन के उपयोग की सम्भावना शाक्तोपाय पर ही निर्भर है।' अतः
विज्ञ पाठक-जन का ध्यान इस बात की ओर आकृष्ट करना आवश्यक है कि स्पन्द-
शाखा शाक्तोपाय के अन्तर्गत ही मानी गई है। साधारण साधक के लिए यही उपाय
सुलभ है।
पन्द्रहवीं शताब्दी तक शिवसूत्र पर संस्कृत में एक वृत्ति, दो वार्त्तिक और एक
टीका लिखी गई। यद्यपि आधुनिक काल में भी इस ग्रन्थविशेष के हिन्दी और अंग्रेजी
में व्याख्या तथा अनुवाद छप चुके हैं तथापि अद्वैत शैव दर्शन में पारंगत, धुरन्धर
विद्वान् और सफल योगी श्रीस्वामी लक्ष्मण जू ने शिवसूत्र पर इस 'विमर्श' नाम की
हिन्दी टीका को 'साधक-जन के अवगाहनाथं सरल तथा सुबोध' बताकर सराहा है।
तभी तो भक्त-जन और विचारक-वर्ग के समक्ष इसे प्रस्तुत करने का साहस किया जा
रहा है। विनीत लेखक ने इन सूत्रों पर, कई वर्ष पूर्व श्रीस्वामीजी महाराज के चरण
कमलों के समक्ष बैठकर विचार किया था। फिर जब इस 'शिवसूत्र विमर्श' की पाण्डु-
लिपि को भगवत्पाद के सामने रखा तो इसका आद्योपान्त अवलोकन कर उन्होंने हर्ष
पूर्वक इसे मुद्रण में लाने की इच्छा प्रकट की। अतः
“तवैव वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये”।
अन्त में आशीर्वादात्मक धन्यवाद के पात्र हैं श्री ओं प्रकाश कौल जिन्होंने प्रेमपूर्वक,
शुद्ध और स्वच्छ ढंग से प्रेस-कापी तैयार की, और अनुपम कौल जिसने दक्षता से पुस्तक
का पुनरवलोकन किया। उन सज्जनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है जिनके सफल
परामर्श से यह यज्ञ सम्पन्न हुआ। नैवेद्य साधक तथा पाठक-जन के हाथ में है।
ज. न. क.

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सूत्र पृष्ठ

शिवसूत्र

प्रथम विकास

सूत्र पृष्ठ
१. चैतन्यमात्मा । १
२. ज्ञानं बन्धः । २
३. योनिवर्गः कलाशरीरम् । ३
४. ज्ञानाधिष्ठानं मातृका । ३
५. उद्यमो भैरवः । ३
६. शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः । ५
७. जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तभेदे तुर्याभोगसंभवः । ५
८. ज्ञानं जाग्रत् । ६
९. स्वप्नो विकल्पाः । ६
१०. अविवेको मायासीषुप्तम् । ६
११. त्रितयभोक्ता वीरेशः । ७
१२. विस्मयो योगभूमिकाः । ७
१३. इच्छाशक्तिरुमा कुमारी । ८
१४. दृश्यं शरीरम् । ८
१५. हृदये चित्तसंघट्टाद्दृश्यस्वापदर्शनम् । ९
१६. शुद्धतत्त्वसंधानाद्वाऽपशुशक्तिः । १०
१७. वितर्क आत्मज्ञानम् । ११
१८. लोकानन्दः समाधिसुखम् । ११
१९. शक्तिसंधाने शरीरोत्पत्तिः । ११
२०. भूतसंधान-भूतपृथक्त्व-विश्वसंघट्टाः । १२
२१. शुद्धविद्योदयाच्चक्रेशत्वसिद्धिः । १३
२२. महाह्रदानुसंधानान्मन्त्रवीर्यानुभावः । १३

द्वितीय विकास

१. चित्तं मन्त्रः । १४
२. प्रयत्नः साधकः । १४
३. विद्याशरीरसत्ता मन्त्ररहस्यम् । १५
४. गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः । १७

xvi
सूत्र पृष्ठ
५. विद्यासमुत्थाने स्वाभाविके खेचरी शिवावस्था। १८
६. गुरुरुपायः। २०
७. मातृकाचक्रसंबोधः। २०
८. शरीरं हविः। २१
९. ज्ञानमन्नम्। २२
१०. विद्यासंहारे तदुत्थस्वप्नदर्शनम्। २३
तृतीय विकास
१. आत्मा चित्तम्। २४
२. ज्ञानं बन्धः। २५
३. कलादीनां तत्त्वानामविवेको माया। २५
४. शरीरे संहारः कलानाम्। २७
५. नाडीसंहार-भूतजय-भूतकैवल्य-भूतपृथक्त्वानि। २९
६. मोहावरणात् सिद्धिः। ३१
७. मोहजयादनन्ताभोगात् सहजविद्याजयः। ३३
८. जाग्रत् द्वितीयकरः। ३४
९. नर्तक आत्मा। ३४
१०. रङ्गोऽन्तरात्मा। ३५
११. प्रेक्षकाणीन्द्रियाणि। ३५
१२. धीवशात् सत्त्वसिद्धिः। ३५
१३. सिद्धः स्वतन्त्रभावः। ३६
१४. यथा तत्र तथान्यत्र ३७
१५. बीजावधानम्। ३७
१६. आसनस्थः सुखं हृदे निमज्जति। ३८
१७. स्वमात्रानिर्माणमापादयति। ३९
१८. विद्याऽविनाशे जन्मविनाशः। ३९
१९. कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः पशुमातरः। ४०
२०. त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम्। ४०
२१. मग्नः स्वचित्तेन प्रविशेत्। ४१
२२. प्राणसमाचारे समदर्शनम्। ४२
२३. मध्येऽवरप्रसवः। ४२
२४. मात्रास्वप्रत्ययसंधाने नष्टस्य पुनरुत्थानम्। ४३
२५. शिवतुल्यो जायते। ४६
२६. शरीरवृत्तिर्व्रतम्। ४७

xvii
सूत्र पृष्ठ
२७. कथा जपः ४९
२८. दानमात्मज्ञानम् । ५०
२९. योऽविवस्थो ज्ञाहेतुश्च । ५०
३०. स्वशक्तिप्रचयोऽस्य विश्वम् । ५१
३१. स्थितिलयौ । ५२
३२. तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् । ५३
३३. सुखदुःखयोर्बहिर्मननम् । ५४
३४. तद्विमुक्तस्तु केवली । ५६
३५. मोहप्रतिसंहतस्तु कर्मात्मा । ५६
३६. भेदतिरस्कारे सर्गान्तरकर्मत्वम् । ५७
३७. करणशक्तिः स्वतोऽनुभवात् । ५८
३८. त्रिपदाद्यनुप्राणनम् । ५९
३९. चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु । ६०
४०. अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य । ६५
४१. तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसंक्षयः । ६६
४२. भूतकञ्चुकीतदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः । ६७
४३. नैसर्गिकः प्राणसंबन्धः । ६८
४४. नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्यसौषुम्नेषु । ६९
४५. भूयः स्यात् प्रतिमीलनम् । ७०

(रिक्त पृष्ठ)

शिवसूत्र विमर्श में प्रतिपादित विषय
प्रथम विकास
(शाम्भवोपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण)
क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ
१. आत्मा का लक्षण १ १
२. जीव के बन्धन का कारण २, ३ २
३. तीन मलों का बन्धकत्व ४ ३
(क) उपाय क्रमाभ्यास में—
४. बन्धन से छूटने का उपाय ५ ३
५. भैरव समाधि का प्रकार ६ ५
६. समाधि-व्युत्थान में अभेद ७ ५
७. जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति लक्षण ८,९,१० ६
८. तुर्यातीत अवस्था ११ ७
९. परचित् तत्त्व में स्थिति १२ ७
१०. योगी की इच्छा-शक्ति १३ ८
११. दृश्य-वर्ग अपना ही स्वरूप १४ ८
१२. योगी संसार को कैसे देखता है १५ ९
(ख) अनुपायक्रमाभ्यास में—
१३. अनादिसिद्ध शिव दशा १६ १०
१४. शुद्धतत्त्व में अनुसंधान से साधारण विचार भी स्वात्म-विमर्श
रूप है १७ १०
१५. मायावी जगत् में योगैश्वर्य का चमत्कार
(परिमित सिद्धियां) १८,१९,२० ११
१६. तुर्य का अनुभव २१ १३
१७. तुर्यातीत का अनुभव २२ १३
द्वितीय विकास
(शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन)
१. शाक्त-परामर्श वाले का मन १ १४
२. आराधना में प्रयत्न की आवश्यकता २ १४

XX
क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ
३. मन्त्र-वीर्य ३ १५
४. मितसिद्धियों में ध्येय को भूलना ४ १७
५. ईश्वर-कृपा से परप्रमातृभाव की सहज-स्थिति ५ १८
६. सहज-स्थिति की प्राप्ति का उपाय ६ २०
७. अहं-परामर्श का तात्त्विक क्रम ७,८,९ २०
८. स्वेच्छानुसंधान की कमी—एक रुकावट १० २३
तृतीय विकास
(आणवोपाय द्वारा शिवस्वरूप के आनन्दानुभव का वर्णन)
—साधारण जीवोपाय—
१. जीवात्मा का स्वरूप (तीनों परामर्शों में) १ २४
२. चित्त के बन्धन का कारण २ २५
३. तत्त्वों का अविवेक माया (तत्त्व-वर्णन) ३ २५
(क) आत्म-व्याप्ति प्रकरण—
४. समाधि में ही आत्मलाभ (आणवोपाय से ध्यान की विधि) ४ २७
५. अन्य साधन—प्राणायाम, धारणा, प्रत्याहार, समाधि ५,६ २९
(ख) शिव-व्याप्ति प्रकरण—
६. समाधि और व्युत्थान दोनों में आनन्द ७ ३१
७. शक्तिरूपता का वर्णन ८ ३३
८. विश्वनाटक का नट ९ ३४
९. नट-नाट्य-स्थान १० ३४
१०. विश्वनाटक के दर्शक ११ ३५
११. विशेष सात्त्विक बुद्धि से जगदानन्द-प्राप्ति १२ ३६
१२. स्वतन्त्रता की सिद्धि १३,१४ ३६
१३. स्वरूपस्थिति में सावधानता १५,१६ ३७
१४. विश्वव्यापिनी इच्छा १७,१८ ३९
१५. प्रमादवश मातृका द्वारा बहिर्मुखता १९ ३९
१६. चित्स्वरूपता की अनिवार्यता २० ४०
१७. तीनों अवस्थाओं में तुर्यरस के सेचन का उपाय २१ ४१
१८. योगी की विश्वमय-अवस्था का अनुभव (तुर्यातीत पद) २२ ४३
१९. मन्दप्राय योगी का अनुभव २३,२४ ४३

xxi
क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ
२०. तुर्य-चमत्कार से युक्त योगी २५,२६ ४६
२१. संसिद्ध योगी के आलापादि २७,२८ ४९
२२. परमार्थज्ञान प्रदान करने में समर्थ योगी २९,३०,३१ ५०
२३. तुर्य-चमत्कार के विमर्श से योगी की निष्कम्पता ३२,३३,३४ ५३
२४. कर्मात्मा जीव ३५ ५६
२५. अनर्गल शक्तिपात से स्वातन्त्र्ययोग का उदय ३६,३७ ५७
२६. सावधानता की आवश्यकता (शब्दस्पर्शादि विषयों के उपभोग
पर रुद्रयामलतन्त्र से उद्धृत कई अभ्यासों के उदाहरण) ३८ ५८
२७. बाह्यरूपता में भी अभ्यास का दृढीकरण ३९ ६३
२८. विमर्श शिथिल पड़ने पर विषयोन्मुख प्रसर ४० ६५
२९. तुर्यानन्द दशा में व्यक्तिगत अभिलाषा का नाश ४१ ६६
३०. सुप्रबुद्ध योगी की देह में स्थिति (शंका-समाधान) ४२,४३ ६६
३१. ऐसे योगी की अलौकिकता ४४ ७०
३२. उस परमयोगी के योग का फल ४५ ७१
शिवसूत्रसार — ७२

xxii
या काचिद् वै क्वचिदपि दशा किञ्चिदभ्यासपूरा-
दानन्दाख्या भवभयहरा स्यात् सुभक्तस्य सद्यः ।
सिद्धिः सैषा सुरपितृनृणां यस्य भक्त्या भवेन्नु
तं स्वात्मानं विभववपुषं सद्गुरुं वै प्रपद्ये ॥
अर्थ—'कहीं किसी दीर्घकाल तक निरन्तर चलने वाले धारावाहिक अभ्यास
से किसी श्रेष्ठ भक्त को तो तत्काल कोई अनिर्वचनीय, भवभयहारिणी आनन्दा-
वस्था प्राप्त हो जाती है, वही उसकी सिद्धि है । देवताओं, पितरों तथा मनुष्यों
को यह उत्कृष्ट सिद्धि, जिनकी भक्ति (सेवा-पूजा) से उपलब्ध होती है. उन
ज्ञानादि ऐश्वर्यमय स्वरूप वाले निजात्म-स्वरूप सद्गुरु की मैं शरण लेता हूं।'

ॐ नमः श्री शाम्भवे स्वात्मानन्दप्रकाशवपुषे
शिवसूत्र विमर्श
प्रथम विकास
पहले विकास में शाम्भव उपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण
कहा है । शाम्भव उपाय इस प्रकार है :
'अकिञ्चिच्चिन्तकस्यैव गुरुणा प्रतिबोधतः ।
जायते यः समावेशः शाम्भवोऽसावुदाहृतः ॥'
(मालिनीविजयोत्तर तन्त्र अधिकार २, श्लोक २३)
अर्थ—गहरे और गम्भीर स्वरूप-ज्ञान के द्वारा निर्विकल्पभाव में स्थिति पाये हुये
योगी को (सद्गुरु कृपाकटाक्ष से) जो भगवदावेश होता है उसे (शाम्भवोपाय से प्राप्त)
शाम्भव मुद्रा कहते हैं ।
अब प्रस्तुत सूत्र में सूचित किया जाता है कि शिव कौन है, उसका स्वरूप क्या है
और शैवदर्शन में उसका वर्णन किस प्रकार हुआ है ।
चैतन्यमात्मा ॥१॥
चैतन्यम्—ज्ञानरूप क्रिया में स्वातन्त्र्य
आत्मा—भाव और अभावरूप जगत् का स्वरूप (है) ।
व्याख्या—जिससे चेतना प्रधान होती है वह चेतन है। उसका ज्ञानरूप क्रिया में
स्वातन्त्र्य ही चैतन्य है । यही आत्मा अर्थात् चेतनता का स्वरूप है । चेतनता ही भूः
भुवः स्वः रूप इस सारे जगत् का स्वरूप है । यह लौकिक देह, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य,
बुद्धि, जाग्रत्, आदि आत्मा नहीं हैं । अतः इस भावरूप और अभावरूप जगत् का जो
स्वभाव है वही आत्मा है । वह सब प्रकार की ज्ञानरूप क्रिया में स्वतन्त्र है । अतः
जानने की क्रिया में स्वातन्त्र्य ही आत्मा है । इस सम्बन्ध में यह वार्तिक है :
“चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् ।
तस्यानावृतरूपत्वाच्छिवत्वं केन वार्यते ॥”
(भट्टभास्कर विरचित शिवसूत्र वार्तिक-१५)
अर्थ—जानने की क्रिया में स्वतन्त्रता ही चैतन्य-आत्मा का स्वरूप है । मलत्रय के
आवरण से रहित होने के कारण उसके शिवभाव में कोई बाधा नहीं रहती ।

२ : शिवसूत्र विमर्श
चैतन्य (चिति) ही आत्मा है । अतः चैतन्य और आत्मा में राहु के शिर की
तरह कल्पना से ही भेद दिखाई देता है । वास्तव में कोई भेद नहीं ।
जो चेत्यमान न हो ऐसा स्वभाव न कोई हो सकता है, न किसी का हो सकता है
और न कभी हो सकता है । अतः चेत्यमान स्वप्रकाश चिदेकरस चैतन्य ही स्वभाव है,
वही आत्मा है । जब चैतन्य समस्त विश्व का स्वभाव है तो उसकी साधना ही क्या
और उसके लिये उपाय ही कैसा । इसमें प्रमाण की कोई आवश्यकता ही नहीं, क्योंकि
चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश चिद्रूप है और उस पर कोई आवरण नहीं डाल सकता है ।
श्री त्रिकहृदय में कहा है :
"स्वपदा स्वशिरश्छायां यद्वल्लङ्घितुमीहते ।
पादोद्देशे शिरो न स्यात्तथैवं बैन्दवी कला ॥"
अर्थ—ज्यों ज्यों अपना पैर अपने ही सिर की छाया को लाँघने की इच्छा से आगे
बढ़ता है त्यों त्यों सिर की छाया आगे और आगे होती जाती है । यही बात बैन्दवी
कला (चिति) के विषय में है । चिति को, उसी से बनी, बुद्धि आदि से समझना
असंभव है । और भी, स्पन्दकारिका में :
"तेन शब्दार्थचिन्तासु न सावस्था न यः शिवः ।
भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः ॥"
अर्थ—सर्वात्मक स्वभाव से शब्द और अर्थ की चिन्ता में वह कोई अवस्था नहीं
है जो शिवभाव को प्रकट न करती हो । अतः भोक्ता ही भोग्यरूप में सदा और
सर्वत्र ठहरा है ।
यह स्वरूप-विकास-शक्ति ही स्वातन्त्र्य शक्ति है । अतः शिव का स्पन्दतत्त्वरूप
चैतन्य सदा स्वयंप्रकाश परमार्थसत् है ॥१॥
सम्बन्ध—आत्मा का लक्षण बता कर अब जीव के बन्धन का कारण अगले दो सूत्रों
में बताते हैं ।
ज्ञानं बन्धः ॥२॥
ज्ञानं—अनात्मा (अर्थात् देह, प्राण, पुर्यष्टकादि रूप) को ही आत्मा जानना
बन्धः—बन्धन है ।
व्याख्या—विषयों का ज्ञान होना ही बन्धन है । इस प्रकार जिस अवस्था में द्वैत
का ज्ञान होता है वह अज्ञान है और बन्धन का कारण है । ऐसा आणवमल के कारण
होता है । आत्मा में जब अपूर्णता का अनुभव होता है तब इसे आणवमल कहते हैं ।
इसी से आत्मा अणु अर्थात् जीव कहलाता है । वह देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि को ही
आत्मा जानता है जिससे उसे विषयों का ही ज्ञान रहता है ॥२॥

प्रथम विकास : ३
सम्बन्ध—यही आणवमल संसार के अङ्कुर का कारण (कार्ममल) बन जाता है
जिसकी ओर अगले सूत्र में संकेत किया है।
योनिवर्गः कलाशरीरम् ॥३॥
योनि—भेदप्रथा की हेतु माया (का)
वर्गः—प्रपञ्च अर्थात् फैलना (यह मायीयमलस्वरूप बन्धन है और)
कलाशरीरम्—(कलातत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक शुभाशुभवासनामय) जो
व्यापार है वह भी बन्धन का हेतु है।
व्याख्या—माया का समूह ही भेदप्रथा का हेतु है। (भिन्नवेद्यप्रथा) वेद्यवर्ग में
भिन्नता के ज्ञान को मायीयमल कहते हैं। अतः 'यह', 'वह', 'मैं' आदि का ज्ञान भी
बन्धन है। इस स्वरूप-संकोच शक्ति को माया-शक्ति कहते हैं।
जीव में जब 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि शुभ और अशुभ वासनायें पैदा
होती हैं तो इसे कार्ममल कहते हैं। इसमें जन्म और भोग को देने वाले कर्त्ता आत्मा
का अबोध होता है। यह भी जीव के बन्धन का कारण है ॥३॥
सम्बन्ध—अब इन तीनों मलों का बन्धकत्व कहते हैं।
ज्ञानाधिष्ठानं मातृका ॥ ४ ॥
ज्ञान—द्वैतज्ञान का
अधिष्ठानं—आधार (अर्थात् आणवमल, मायीयमल और कार्ममलरूप
कारण)
मातृका—बहिर्मुखता को प्राप्त हुई संवित् (अर्थात् अज्ञाता-माता) है।
व्याख्या—तीन मलों के आवरण से जीव को द्वैतज्ञान की दृढ़ता होती है। इससे
वह ऐसे बन्धन में पड़ जाता है कि स्वात्म-विश्रान्तिरूप अन्तर्मुख-भाव से निरन्तर अलग
रहता है और बहिर्मुखता के ज्ञान में भूला रहता है। यह सब अज्ञात संवित् के कारण
ही होता है। अतः जीव बन्धन में रहता है ॥४॥
सम्बन्ध—अब इस बन्धन के सम्बन्ध से छूटने का उपाय (जो मलत्रय को हटाना
है) कहते हैं।
उद्यमो भैरवः ॥ ५ ॥
उद्यमः—मलत्रय को हटाने का उद्योग।
भैरवः—भैरव रूप (अर्थात् स्वस्वरूप को प्रकट करने का हेतु) है।

४ : शिवसूत्र विमर्श
व्याख्या—तीन मलों को, जिन से आवृत होने के कारण जीवभाव प्राप्त हुआ है,
हटाने और समस्त जगत् में परिपूर्ण अहं-परामर्श करने में उद्योग करना चाहिये। क्षण-
मात्र में स्पन्दशक्ति के उच्छलन से स्वात्म संवित् का अनुभव होता है। सारा जगत्
इसी प्रतिभा में डूब जाता है। सारे विश्व में पूर्णाहन्ता का अभ्यास करने से समस्त
शक्तियों का प्रादुर्भाव होता है जिससे समस्त विकल्पों का भेदन होता है और कोई मल
नहीं दबा सकता है। इसी को भैरवभाव या भैरवसमाधि कहते हैं।
भैरवरूप इस स्वस्वरूप को प्रकट करने के लिये स्वरूप-संवित् के विमर्श में नित
नयेपन का अनुभव होता है।
श्रुतपूर्व अनुभव से अभ्यास फलित नहीं होता है। जैसे अष्टावक्रगीता में कहा है :
'मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति' अर्थात् मूढ़पुरुष योगाभ्यासरूप कर्म करके
(देहाभिमान दूर होने के बिना ही) ब्रह्मरूप होने की इच्छा करता है इस कारण ब्रह्म
को प्राप्त नहीं होता है।
अतः साधक को सावधान रहना चाहिये। जब तक देहाभिमान दूर न हो जाये
तब तक धीर बन कर अभ्यासपथ पर नित नये अनुभव करते हुए अग्रसर होने के उद्यम
में रहना आवश्यक है। अष्टावक्र जी राजा जनक को आगे कहते हैं :
'अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्'
अर्थ—धीर पुरुष मोक्ष की इच्छा न करता हुआ भी परब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त
होता है क्योंकि उसका देहाभिमान दूर हुआ होता है।
'तावद्वै ब्रह्मवेगेन मथनं शक्तिविग्रहे'
(तब तक, निश्चय ही, ब्रह्मवेग-समाधि१ से ही शक्ति-समूह का मथन करना
चाहिये।)
अतः पूर्णाहन्ता के विमर्श में साधक को इतना अभ्यासशील रहना चाहिये कि उसे
जाग्रत् अथवा व्युत्थान दशा में भी भेद का आभास तक न रहे। ऐसा विमर्श साधक को
शक्तिपात द्वारा ही प्राप्त होता है। स्वरूपोपलब्धि के लिये मलत्रय हटाने की अत्यन्ता-
वश्यकता है। इसके लिये साधक को तत्पर रहना चाहिये। महिम्नस्तोत्र में कहा है :
'नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव'
१. हठपूर्वक नियम-बद्ध होकर परब्रह्मस्वरूप के चिन्तन में लगे रहना ब्रह्मवेग-समाधि
है। इसी की ओर संकेत देखिये रामगीता में—
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं, तावन्मदाराधनतत्परो भवेत् । (रामगीता-५८)

प्रथम विकास : ५
अर्थ—तीन मलों से आवृत जीव (मनुष्य) इनको हटाने के दृढ़ अभ्यास से चिदा-
नन्दस्वरूप शिव से एक होते हैं जैसे सब छोटी-बड़ी नदियाँ एक ही समुद्र को प्राप्त कर
एक रूप होती हैं :
अतः 'उद्यमो भैरवः' सूत्र का तात्पर्य यही है कि साधक को 'तद्बुद्धयस्तदात्मानः'
(आत्मा में ही मन और बुद्धि लगा कर) रहना चाहिये ॥५॥
सम्बन्ध—बन्धन से छूटने के लिये अब भैरव-समाधि का प्रकार कहते हैं ।
शक्तिचक्रसंधाने विश्वसंहारः ॥ ६ ॥
शक्ति—शब्दादि शक्तियों (के)
चक्र—समूह (के)
संधाने—उन्मेष और अहंपरामर्शरूप अनुसंधान के होने पर
विश्व—भेदप्रथा रूप मलत्रयमय जगत् का
संहारः—परसंवित्‌रूप अग्नि में एकीकार होता है ।
व्याख्या—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध यह शक्तियों का समूह है । इनको
स्वरूप में विमर्श करना चाहिये । उस से परसंवित् रूप अग्नि में भेद प्रथा पैदा करने
वाले तीन मल भस्मीभूत होते हैं । यह शब्दादि भैरवरूप संवित्स्फार की महान् शक्तियाँ
हैं जो शाम्भवोपाय में क्रम और अक्रम का भी उल्लंघन करती हैं। शिवभाव से पृथ्वी
तत्त्व तक का यह शक्तिप्रसार प्रतिलोम वृत्ति से इन्हीं शक्तियों के संधान, अर्थात्
पर-संवित् स्वात्म-चमत्कृति, में एकीकार करना है । इसी से भेदमय जगत् का ह्रास
और शिवभाव की प्राप्ति होती है । यह शाम्भवोपाय में भैरव-समाधि है ॥६॥
सम्बन्ध—ऐसे योगी को समाधि और व्युत्थान का कोई भेद नहीं होता, यह कहते हैं।
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे तुर्याभोगसम्भवः ॥७॥
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिभेदे—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की नानारूपता में पृथक्-
पृथक् अवभास होने पर
तुर्य—आत्मस्फुरणरूप तुर्यावस्था (के)
आभोग—चमत्कार (की)
सम्भवः—प्राप्ति (होती है) ।
व्याख्या—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में नानारूपता होती है । इन तीनों
अवस्थाओं में पृथक्-पृथक् अवभास होते हैं । परन्तु भैरव-समाधि का अभ्यास करने वाले
योगी को दोनों निमेषरूप समाधि और उन्मेषरूप समाधि में आत्मस्फुरण के अनुभव का
चमत्कार रहता है । इसे तुर्य अवस्था कहते हैं । ऐसे योगी को समाधि तथा व्युत्थान

६ : शिवसूत्र विमर्श
में कोई अन्तर नहीं रहता । वह यथास्थित अवस्था में स्वरूप संवित् के चमत्कार का
आनन्द लेता है । कहा भी है :
“यथास्थितः तथैवासुः मा गा बाह्यं तथान्तरम् ।”
केवलं चिद्विकासेन विकारनिकराञ्जहि ॥७॥
सम्बन्ध—अब अगले तीन सूत्रों में जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के लक्षण क्रम से
कहते हैं ।
ज्ञानं जाग्रत् ॥८॥
ज्ञानं—(बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ) सर्वसाधारण अर्थ के विषय-वाला ज्ञान
जाग्रत्—जाग्रत् (अवस्था कहलाती है) ।
व्याख्या—जागते हुये भी यदि जीव को कभी असाधारण अर्थ के विषय का
अस्फुट विवेक हो तो उसे 'जाग्रत् में स्वप्न' कहते हैं । जाग्रत् अवस्था में ही हम कभी
कुछ कहने को उद्यत होते हैं परन्तु इसका अस्फुट-विवेक भी कभी विस्मृति में जाने के
कारण कहा नहीं जाता, इसे जाग्रत्-सुषुप्ति कहते हैं । अतः जागते हुए सभी दशाओं
में जाग्रत् अवस्था नहीं होती है । जाग्रत् केवल बाह्य इन्द्रियों से पैदा हुआ सर्वसाधारण
अर्थ के विषय का ज्ञान है ॥८॥
स्वप्नो विकल्पाः ॥९॥
स्वप्न :—स्वप्नावस्था
विकल्पा :—मनोमात्र से पैदा हुए असाधारण अर्थों का विषय (है) ।
व्याख्या—अस्फुट-विवेक को ही स्वप्न कहते हैं । यह केवल मन के विकार
से ही होता है । स्वप्न में बाह्य इन्द्रिय किसी काम के नहीं होते, वहाँ मन के
कल्पित इन्द्रिय ही कल्पित अथवा असाधारण अर्थों को विषय करते हैं । इस अवस्था में
स्पष्ट विवेक नहीं रहता । जाग्रत् के शरीर की वर्तमान दशा का ज्ञान बहुत ही अस्फुट
रहता है । इस अवस्था की दशायें भी स्वप्न-जाग्रद् तथा स्वप्न-सुषुप्ति के रूप में भिन्न-
भिन्न होती हैं ॥९॥
अविवेको माया सौषुप्तम् ॥१०॥
अविवेकः—विवेकराहित्य (अथवा निश्चित बुद्धि का न रहना, तथा)
माया—मोह (गाढ़ तम)
सौषुप्तम्—सुषुप्ति अवस्था (कहलाती है) ।
व्याख्या—विवेक-बुद्धि के अभाव को अख्याति कहते हैं । यह अख्याति मोह में
पड़ने से होती है । इसी अवस्था को सुषुप्ति कहते हैं । इस में विवेक नहीं रहता ।
यह गाढ़ तमोगुण अवस्था है ॥१०॥

प्रथम विकास : ७
सम्बन्ध—योगी की तुर्य अवस्था के विचार में लौकिक जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति
को समझाया। अब उसी की तुर्यातीत अवस्था का विचार कहते हैं।
त्रितयभोक्ता वीरेशः ॥११॥
त्रितय—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति (अवस्थाओं का)
भोक्ता—स्वतन्त्रता से चमत्कार करने वाला (योगी)
वीरेशः—(भेदप्रथा को ग्रास करने वाले) वीरों में उत्तम वीर (है)।
व्याख्या—जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओं में शक्तिचक्र का अनुसंधान करने वाला
योगी तुर्य के आनन्दरस से भरा रहता है। उसे भेद-प्रथा का अभाव रहता है। इस
आनन्दरस में मग्न वह हर अवस्था में (अश्नन्गच्छन्स्वपन्श्वसन् आदि) परम-व्योम रूप
शिवस्वरूप की भावना में मग्न रहता है और इस प्रकार इन तीनों अवस्थाओं में स्वा-
तन्त्र्य के चमत्कार से पूर्ण होता है। इस अवस्था की स्थिति को तुर्यातीत अवस्था
कहते हैं। उसका स्वातन्त्र्य रूप चमत्कार इस प्रकार कहा गया है :
'त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत्।
तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥' (कठोपनिषद्)
अर्थ—जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में जो कुछ भोग्य [विषय]
भोक्ता [विषयी] और भोग [विषयग्रहण] है, उससे विलक्षण मैं चिन्मात्र सदाशिव
साक्षी सर्वथा भिन्न हूँ।
ऐसा योगी केवल चिन्मात्र ही रहता है। संवित् साम्राज्य का वैभव होने
से वह भेद जगत् को ग्रास करने वाले वीरों में उत्तम वीर है क्योंकि वह अन्तः तथा
बाह्य प्रवणशील इन्द्रियों का अधीश्वर है। उसकी इन्द्रियां भेदप्रथारूप संसार में
ग्रस्त नहीं रहतीं। अतः योगियों में वही उत्तम योगी है। वही तुर्यातीत है ॥११॥
सम्बन्ध—तुर्यातीत योगी की परचित्-तत्त्व में स्थिति को सूचित करने वाली
अवस्था बतलाते हैं।
विस्मयो योगभूमिकाः ॥१२॥
योगभूमिकाः—(ऐसे योगी की) परविश्रान्ति को सूचित करने वाली
भूमिकाएँ (अवस्थाएँ)
विस्मयः—अवर्णनीय आश्चर्य (की मुद्रायें) हैं।
व्याख्या—जैसे किसी को अतिशय आनन्द की वस्तु पाकर आश्चर्यपूर्ण हर्ष होता
है वैसे ही परानन्द की अनुभूति में मग्न इस तुर्यातीत अवस्था में स्थित योगी को पर-
विश्रान्ति को सूचित करने वाली अवर्णनीय आश्चर्य-मुद्रायें होती हैं। उसके बोधसुधा

८ : शिवसूत्र विमर्श
रूप समुद्र की कोई परिधि नहीं होती । स्वात्मानन्द में अतृप्त होने से उससे यह आश्चर्य
प्रकट होते हैं ।
'सुखे दुःखे विमोहे च स्थितोऽहं परमः शिवः'
अर्थ—सांसारिक सुख (सत्त्व) दुःख (रजस्) और मोह (तमस्) की अवस्थाओं में
भी मैं परमशिव स्वरूप ही ठहरा हूँ ॥१२॥
सम्बन्ध—ऐसे योगी की इच्छा को कोई शक्ति रोक नहीं सकती ।
इच्छाशक्तिरुमा कुमारी ॥१३॥
इच्छाशक्तिः—(ऐसे योगी की) इच्छाशक्ति
उमा—परा-रूप पारमेश्वरी स्वातन्त्र्य शक्ति (है)
कुमारी—(और वही) विश्व के सर्जन तथा संहार करने की क्रीडा में
तत्पर है ।
व्याख्या—तुर्यातीत योगी की इच्छा शक्ति, शक्तिपात द्वारा प्राप्त हुई युक्ति से
पर-भैरवरूप ही होती है । उसी विश्व के सर्जन तथा संहार में क्रीड़नशीला शक्ति के
योग से वह सारे दृश्यजगत् में अप्रतिहत (बेरोक) स्वातन्त्र्यमय हो जाता है । वह
सदाशिव से पृथ्वी तत्त्व तक सारे दृश्यवर्ग को अपना अङ्ग (स्वरूप) ही देखता है ।
उसे आवरण-रहित चिद्घनरूप का स्फुरण होता है ।
'या अस्य इच्छा सा अस्य शक्तिः सा च कुमारी'
अर्थ—जो इसकी इच्छा है वही इसकी पारमेश्वरी शक्ति है और वही जगत् के
सृष्टि-स्थिति रूप क्रीडा में तत्परता है ॥१३॥
सम्बन्ध—ऐसे प्रभाववाली इच्छाशक्ति से युक्त योगी के लिये दृश्यवर्ग अपना स्वरूप
होता है, ऐसा कहते हैं ।
दृश्यं शरीरम् ॥१४॥
दृश्यं—(जगत् में जो) दृश्य पदार्थ (हैं)
शरीरम्—(वह उसका) स्वरूप (है) ।
व्याख्या—जो बाह्य (घटपटादि, नीलपीतादि) तथा आभ्यन्तर (देहादि) जगत्रूप
दृश्य अर्थात् वेद्यवर्ग है वह सब यह अपने स्वरूप से अभिन्न अनुभव करता है । सारे
दृश्य पदार्थ को अहंरूपता से देखता है । सारे विश्व को अपना शरीर जानता है ।
यह समझने के लिये एक कथा प्रस्तुत की जाती है—एक बार इन्द्र अपनी सभा
में प्रसन्न होकर विराजमान थे । नर्तकियां नृत्य करती थीं । गायक संगीत से आह्ला-
दित करने में व्यस्त थे । सामने दो हाथी आपस में एक दूसरे से टकराने का विनोद
करते थे । इन्द्र यह सब देखकर आनन्दित था । इतने में भगवान् शिव उधर आ

सूत्र में बताते हैं।

प्रथम विकास : ९
पहुँचे । इन्द्र अपने विनोद में मस्त थे। वह भगवान् शिव का स्वागत करने अपने
आसन से नहीं हिले । भगवान् शिव अन्दर आये और अपनी जटाओं को एक झटका
मारा तो आसपास के दो पर्वत आपस में टकराने लगे । इस से नृत्य, संगीत और
हाथियों की टक्कर यह सब नष्ट-भ्रष्ट होने लगा । इन्द्र ने डर कर कहा, "भगवन् !
यह क्या हुआ और कैसे हुआ ?" भगवान् शिव ने कहा कि विषयभोग में अपना विनोद
मानना सांसारिक सुख-दुःख देता है । सारे दृश्यवर्ग में अहंता के अनुभव से विश्व का
सर्जन तथा संहार अपनी क्रीडा ही तो होती है ।
इस सूत्र का अर्थ दूसरे प्रकार से भी किया जा सकता है। वह है—
शरीरं दृश्यम् ॥
शरीर—देह, प्राण, पुर्यष्टक आदि (जिसको साधारण जन अहंता रूप से
देखते हैं)
दृश्यम्—(उसे भी वह) इदं रूप (में देखता है) ।
व्याख्या—वह योगी देह, प्राण आदि सब को आत्म-सत्ता से अलग समझ कर
स्वरूप-चैतन्य से विचलित नहीं होता । उसका निश्चय होता है कि आत्मसत्ता के बिना
देहादि ठहर नहीं सकते । अतः यह चित्स्वरूप से भिन्न हैं और त्याज्य हैं, उसे अपना
शरीर भी ऐसा ही प्रतीत होता है । इस प्रकार वह योगी देहादि को इदंरूप जानकर
भेद का निराकरण करके स्वयं पूर्णाहन्ता में मग्न रहता है ॥१४॥
सम्बन्ध—इस प्रकार जगद्रूप दृश्य को अहंकरूपता से स्वरूप में अथवा देह, प्राण,
पुर्यष्टक आदि को इदंरूप दृश्यवर्ग मानकर योगी संसार को कैसे देखता है, यह अगले
सूत्र में बताते हैं।
हृदये चित्तसंघट्टाद् दृश्यस्वापदर्शनम् ॥१५॥
चित्तसंघट्टात्—चंचल चित्त की एकाग्रभावना से (ऐसा योगी)
हृदये—संवित् में (अथवा चेतनता की पूर्णता के अनुभव में)
दृश्य—जाग्रत् तथा स्वप्न अवस्था-रूप दृश्य (इदंता-रूप प्रमेय वर्ग) और
स्वाप—सुषुप्तिरूप दृश्य (अहंतारूप प्रमातृवर्ग को)
दर्शनम्—(अद्वैत भावना के दृढ़ होने के कारण) आत्मस्वरूप ही देखता है ।
व्याख्या—चित्त स्वभाव से चंचल है । योगी जब एकाग्रभावना में दृढ़ होता है तो
चेतनता की पूर्णता में अहंता का अनुभव करने लगता है । संवित् के इस महाबोध में
वह जाग्रत् तथा स्वप्नरूप दृश्य और सुषुप्ति-रूप दृश्य को आत्मस्वरूप में ही देखता है ।
इस आरोहक्रम के अभ्यास में वह भाव और अभाव रूप जगत् को अपना अंग मानकर
स्वरूपचमत्कार का आनन्द लेता है । यह उपायक्रमाभ्यास से मुक्तशिव की अवस्था
है ॥१५॥

१० : शिवसूत्र विमर्श
सम्बन्ध—उपायक्रमाभ्यास कहकर अब अनुपाय-क्रमाभ्यास में अनादिसिद्ध शिवदशा
का वर्णन करते हैं । यह पूर्णाहंता-विमर्श में दूसरा उपाय है ।
शुद्धतत्त्वानुसंधानाद्वा अपशुशक्तिः ॥१६॥
वा—दूसरे उपाय (अनुपायक्रमाभ्यास) से
शुद्धतत्त्व—(परम शिवरूप) शुद्धतत्त्व में
अनुसंधानात्—प्रपञ्च के ('विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ', इस) तन्मयभाव से
अपशुशक्तिः—जगत् के पति शिव (अर्थात् जीवभाव रहित) शक्ति (का अनु-
भव योगी को होता है) ।
व्याख्या—दूसरे उपाय अर्थात् अनुपायक्रमाभ्यास से जब योगी परमशिवरूप शुद्धतत्त्व
में 'विश्वात्मा शिव ही मैं हूँ' इस भावना के दृढ़ अभ्यास से प्रपञ्च की तन्मयता का
अनुभव करता है तब उसे पशु अर्थात् जीवभाव की बन्धशक्ति नहीं रहती और वह
सदाशिव की तरह जगत् का पति बन जाता है । पूर्णाहंता में स्थित यह योगी समाधि
का अभ्यास करे अथवा न करे, इससे उसे कोई प्रयोजन नहीं है । योगवासिष्ठ में
कहा है—
समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा ।
हृदयेनास्तसर्वाशो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥
अर्थ—जिसके अन्तःकरण में शिवोऽहम् भावना के दृढ़ होने पर सब प्रकार की द्वैत-
मूलक आशायें अस्त हो गई हैं वह (योगी) समाधि का अभ्यास करे अथवा न करे,
देहादि सम्बन्धी कर्म करता रहे अथवा न करे, उत्तम आशय वाला सदा ही मुक्त माना
जाता है । ऐसे योगी के लिये हठसमाधि का अनुष्ठान भी बन्धन ही है । अष्टावक्रगीता
में कहा गया है—
निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः ।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ (१५-१)
अर्थ—तू सर्वसम्बन्धशून्य, फलाकांक्षा की क्रिया से रहित, शुद्धतत्त्वरूप स्वप्रकाश
और अभेदभावना से निर्मल है । इस कारण सविकल्प हठसमाधि का अनुष्ठान भी तेरा
बन्धन है ।
अतः स्वरूपज्ञान के अतिरिक्त किसी उपाय का अनुष्ठान मात्र भी ऐसे आत्मज्ञानी
योगी के लिये बन्धन ही है । वह प्रारब्धानुसार यथाप्राप्त स्थिति में भी निरावरण
स्वरूपलाभ से युक्त है ॥१६॥
सम्बन्ध—शुद्धतत्त्व में अनुसंधान वाले जिसके बन्धन नष्ट हो चुके हैं ऐसे योगी के
लिये साधारण विचार भी स्वात्मविमर्शरूप ही होते हैं, अब यह बताते हैं ।