शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंशिवसूत्र विमर्श में प्रतिपादित विषय
प्रथम विकास
(शाम्भवोपाय की दृष्टि से शिवस्वरूप के अनुभव का स्फुरण)
क्रमांक विषय सूत्रांक पृष्ठ
१. आत्मा का लक्षण १ १
२. जीव के बन्धन का कारण २, ३ २
३. तीन मलों का बन्धकत्व ४ ३
(क) उपाय क्रमाभ्यास में—
४. बन्धन से छूटने का उपाय ५ ३
५. भैरव समाधि का प्रकार ६ ५
६. समाधि-व्युत्थान में अभेद ७ ५
७. जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति लक्षण ८,९,१० ६
८. तुर्यातीत अवस्था ११ ७
९. परचित् तत्त्व में स्थिति १२ ७
१०. योगी की इच्छा-शक्ति १३ ८
११. दृश्य-वर्ग अपना ही स्वरूप १४ ८
१२. योगी संसार को कैसे देखता है १५ ९
(ख) अनुपायक्रमाभ्यास में—
१३. अनादिसिद्ध शिव दशा १६ १०
१४. शुद्धतत्त्व में अनुसंधान से साधारण विचार भी स्वात्म-विमर्श
रूप है १७ १०
१५. मायावी जगत् में योगैश्वर्य का चमत्कार
(परिमित सिद्धियां) १८,१९,२० ११
१६. तुर्य का अनुभव २१ १३
१७. तुर्यातीत का अनुभव २२ १३
द्वितीय विकास
(शाक्तोपाय के द्वारा शिवस्वरूप के अनुभव का वर्णन)
१. शाक्त-परामर्श वाले का मन १ १४
२. आराधना में प्रयत्न की आवश्यकता २ १४