शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा
स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)
सूत्र के अनुसार
शिवसूत्र-विमर्श
शुद्धि-अशुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
७ १४ ६ठा कैवल्योपनिषद् कठोपनिषद्
८ २९ ३रा होकर हाकर
१० १९ १ला देहादि देहाहि
१५ ३ ३रा वह बह
१८ ३३ १ला विद्यासमुत्थान वद्यासमुत्थान
१९ ९ ३रा (१२-६) (२२-६)
१९ १४ ८वां अनुकरण अनुसरण
२० २१ ८वां " .,
२१ २१ ३रा १८ २८
२१ २२ ६ठा निर्मुक्त विमुक्त
२७ ३० ७वां युक्तियों व्यक्तियों
२८ ५ १३वां शक्ति व्यक्ति
२८ १५ ४था योगी योगो
२८ १९ ५वां १२८ २२८
२८ १९ ७वां १६-१९ २६-२९
२९ ४ ४था पंच प्रवाहों पंच
३३ २० ३रा हेतुरूपिणी सेतुरूपिणी
३७ २६ ४था विभाव्यते विभाज्यते
४१ ९ १३वां द्वार द्वारा
४४ ५ १५वां 'विद्यासंहारे तदुत्थ- उसे... तुर्यावस्था
स्वप्नदर्शनम्' (२-
१०)—शुद्ध विद्या के
लोप होने पर उस से
उत्पन्न भेदमय प्रपञ्च
में डूबता है—इस
सूत्र के अनुसार
- ८२ -
पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
४६ ४ ७वां भली भला
५१ ४ ७वां समर्थ) (समर्थ)
५७ २६ ६ठा गुणता का गुणता
६० २६ ६ठा को का
६० २८ १ला लेहनामन्थनाकोटैः लेहनामन्थनाकोटौ
६० २९ १ला शक्त्याभावेऽपि शक्ताभावेऽपि
६२ १३ ९वां मल— मल-
६२ १५ १ला हटने हटाने
६२ २१ २रा × आप
६२ २१ ५वां आप चित्स्वरूप चित्स्वरूप
६३ (नोट १.)४ ९वां hideous hidepus
६३ ( ,, )६ ८वां throttle toeerate
६३ ( ,, )७ Missing All those shalt. —
thou toierate
६५ ३० ९वां × जैसे
६७ १ ७वां सद्गुरु सद्गुण
६८ (नोट १)४ ३रा स्वपितराः स्वपितरः
७१ नोट १ के साथ यह प्रमाण श्लोक जोड़ लेना चाहिए—
अयं रसो येन मनागवाप्तः स्वच्छन्दचेष्टानिरतस्य तस्य ।
समाधियोगव्रतमन्त्रमुद्रा जपादिचर्या विषवद्विभाति ॥
अर्थ—वह परम-शिव भाव में रस-रत्ता मगन-मत्ता रहता है । इस निरपेक्ष
भाव में अब चिन्तन के लिए बैठना, नौरात्रादिव्रत, नियन्त्रणार्थ मुद्राएँ तथा
प्रार्थनादि उसे विष जैसे लगते हैं।
७२ ३० १०वां चैतन्यमात्मा चैत्यमात्मा
७३ ११ सूत्र ८ स्वतोऽनुभवात् स्वतोऽनुवात्
७३ १७ सूत्र १४ चित्तस्थितिवच्छरीर चित्तस्थितिवच्छरो
७४ ६ सूत्र ३१ सत्त्व-सिद्धिः सहैव-सिद्धिः
७४ २३ सूत्र ४८ मात्रस्वप्रत्ययसंधाने मात्रास्वरूपप्रत्यसंधाने
७६ ४१ १ला प्रविशेत्तत्स्वचेतसा प्रविशोत्तत्स्वचेतसा
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अन्य कृतियाँ:-
स्पन्दकारिका
नीलकंठ गुरुटु
शिवशक्तिसामरस्य सदाशिवतत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक सारे जड़चेतनात्मक विश्व का आधारभूत
एवं यथार्थ स्वरूप है। स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी
कहते हैं। इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है। वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक
सामरस्य है। विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है।
फलतः प्रकाश-रूप शिव की निजी अभिन्न अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है।
संस्कृत भाषा से अपरिचित किन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए मूल सूत्रों और
वृत्ति का हिन्दी अनुवाद इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है।
परात्रिंशिका
नीलकंठ गुरुटु
काश्मीर शैवदर्शन में परात्रिंशिका का कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है, यह इसी से ज्ञात हो जाता है कि
सोमानन्द, भवभूति, कल्याण, अभिनवगुप्त, लक्ष्मीराम तथा लासक जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने इसकी
व्याख्याएँ की हैं। इन सबमें अभिनवगुप्त कृत विवरण सर्वाधिक विस्तृत और ग्रन्थ का रहस्य स्पष्ट
करने के लिए अत्युपयुक्त माना गया है।
त्रिकदर्शन के मर्मज्ञ विद्वान श्री नीलकण्ठ गुरुटु ने इस विवरण की हिन्दी में सर्वप्रथम व्याख्या
की है। यह अनुवाद मात्र नहीं, विस्तृत व्याख्या है, जिसमें ग्रन्थ की सारी ग्रन्थियाँ खोलकर रख दी
गई हैं; जहाँ कहीं गूढ़ता रह गई थी, उसे टिप्पणियों में स्पष्ट कर दिया गया है। मूल-पाठ में
विभिन्न टीकाओं में जो विसंगतियाँ थीं, उन्हें भी कई टीकाओं और पाण्डुलिपियों के आधार पर
शुद्ध कर दिया गया है।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम्
जयदेव सिंह
विश्व के कदाचित् प्राचीनतम धर्म-शैव धर्म की मुख्य विधाओं में से एक-कश्मीर का अद्वैत
शैव दर्शन-प्रस्तुत ग्रन्थ का विषय है जिसमें शैव सिद्धान्तों की विशद् व्याख्या की गई है। इसमें
क्षेमराज ने समस्त प्रत्यभिज्ञादर्शन का सार प्रस्तुत किया है।
प्रत्यभिज्ञादर्शन समझने के लिए प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ठीक उसी प्रकार उपयोगी है जैसे वेदान्तदर्शन
समझने के लिए 'वेदान्तसार'। उपोद्घात, पारिभाषिक व दुरूह शब्दों पर टिप्पणियाँ और प्रतिपादित
विषयों का संक्षिप्त सार पुस्तक की मुख्य विशेषताएँ हैं।
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली • मुम्बई • चेन्नई • कोलकाता
बंगलौर • वाराणसी • पुणे • पटना
E-mail: [email protected]
Website: www.mlbd.com
मूल्यः रु० ५० कोड : 27694
ISBN 81-208-2769-4
9788120827691