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शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ

सूत्र के अनुसार

शिवसूत्र-विमर्श
शुद्धि-अशुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
७ १४ ६ठा कैवल्योपनिषद् कठोपनिषद्
८ २९ ३रा होकर हाकर
१० १९ १ला देहादि देहाहि
१५ ३ ३रा वह बह
१८ ३३ १ला विद्यासमुत्थान वद्यासमुत्थान
१९ ९ ३रा (१२-६) (२२-६)
१९ १४ ८वां अनुकरण अनुसरण
२० २१ ८वां " .,
२१ २१ ३रा १८ २८
२१ २२ ६ठा निर्मुक्त विमुक्त
२७ ३० ७वां युक्तियों व्यक्तियों
२८ ५ १३वां शक्ति व्यक्ति
२८ १५ ४था योगी योगो
२८ १९ ५वां १२८ २२८
२८ १९ ७वां १६-१९ २६-२९
२९ ४ ४था पंच प्रवाहों पंच
३३ २० ३रा हेतुरूपिणी सेतुरूपिणी
३७ २६ ४था विभाव्यते विभाज्यते
४१ ९ १३वां द्वार द्वारा
४४ ५ १५वां 'विद्यासंहारे तदुत्थ- उसे... तुर्यावस्था
स्वप्नदर्शनम्' (२-
१०)—शुद्ध विद्या के
लोप होने पर उस से
उत्पन्न भेदमय प्रपञ्च
में डूबता है—इस
सूत्र के अनुसार

  • ८२ -
    पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
    ४६ ४ ७वां भली भला
    ५१ ४ ७वां समर्थ) (समर्थ)
    ५७ २६ ६ठा गुणता का गुणता
    ६० २६ ६ठा को का
    ६० २८ १ला लेहनामन्थनाकोटैः लेहनामन्थनाकोटौ
    ६० २९ १ला शक्त्याभावेऽपि शक्ताभावेऽपि
    ६२ १३ ९वां मल— मल-
    ६२ १५ १ला हटने हटाने
    ६२ २१ २रा × आप
    ६२ २१ ५वां आप चित्स्वरूप चित्स्वरूप
    ६३ (नोट १.)४ ९वां hideous hidepus
    ६३ ( ,, )६ ८वां throttle toeerate
    ६३ ( ,, )७ Missing All those shalt. —
    thou toierate
    ६५ ३० ९वां × जैसे
    ६७ १ ७वां सद्गुरु सद्गुण
    ६८ (नोट १)४ ३रा स्वपितराः स्वपितरः
    ७१ नोट १ के साथ यह प्रमाण श्लोक जोड़ लेना चाहिए—
    अयं रसो येन मनागवाप्तः स्वच्छन्दचेष्टानिरतस्य तस्य ।
    समाधियोगव्रतमन्त्रमुद्रा जपादिचर्या विषवद्विभाति ॥
    अर्थ—वह परम-शिव भाव में रस-रत्ता मगन-मत्ता रहता है । इस निरपेक्ष
    भाव में अब चिन्तन के लिए बैठना, नौरात्रादिव्रत, नियन्त्रणार्थ मुद्राएँ तथा
    प्रार्थनादि उसे विष जैसे लगते हैं।
    ७२ ३० १०वां चैतन्यमात्मा चैत्यमात्मा
    ७३ ११ सूत्र ८ स्वतोऽनुभवात् स्वतोऽनुवात्
    ७३ १७ सूत्र १४ चित्तस्थितिवच्छरीर चित्तस्थितिवच्छरो
    ७४ ६ सूत्र ३१ सत्त्व-सिद्धिः सहैव-सिद्धिः
    ७४ २३ सूत्र ४८ मात्रस्वप्रत्ययसंधाने मात्रास्वरूपप्रत्यसंधाने
    ७६ ४१ १ला प्रविशेत्तत्स्वचेतसा प्रविशोत्तत्स्वचेतसा

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अन्य कृतियाँ:-
स्पन्दकारिका
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संस्कृत भाषा से अपरिचित किन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए मूल सूत्रों और
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की है। यह अनुवाद मात्र नहीं, विस्तृत व्याख्या है, जिसमें ग्रन्थ की सारी ग्रन्थियाँ खोलकर रख दी
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समझने के लिए 'वेदान्तसार'। उपोद्घात, पारिभाषिक व दुरूह शब्दों पर टिप्पणियाँ और प्रतिपादित
विषयों का संक्षिप्त सार पुस्तक की मुख्य विशेषताएँ हैं।
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली • मुम्बई • चेन्नई • कोलकाता
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मूल्यः रु० ५० कोड : 27694
ISBN 81-208-2769-4
9788120827691