सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation

महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज द्वारा

स्रोत: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished108 पृष्ठ
  • ७९ -
    पृष्ठ
    ३०. शिवमहिम्नस्तुति (श्रीपुष्पदन्तप्रणीत)
    नृणामेको गम्यः ० (श्लो० ७) ४
    ३१. शिवस्तोत्रावली (उत्पलदेवकृत)
    अन्तरप्यतितरामणीयसी० (स्तोत्र १३ श्लो० २) ६२
    अन्तरुल्लसदच्छाच्छ० (स्तोत्र १७ श्लो० २६) ४८
    त्वद्विलोकनसमुत्कचेतसो० (स्त्रोत्र १२ श्लो० ६) १९
    यद्यदा'स्थितपदार्थदर्शनं० (स्तोत्र १३ श्लो० ७) ४८
    ३२. शिवसूत्र (वसुगुप्तकृत)
    आत्मा चित्तं (वि० ३ सू० १) २५
    उद्यमो भैरवः (वि० १ सू० ५) ५
    कवर्गादिषु माहेश्वर्याद्याः० (वि० ३ सू० १९)
    ज्ञानाधिष्ठानं मातृका (वि० १ सू० ४) ४०
    चित्तं मन्त्रः (वि० २ सू० १) २५
    चैतन्यमात्मा (वि० १ सू० १) ७१
    जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तेषु (वि० १ सू० ७) ४१
    त्रितयभोक्ता वीरेशः (वि० १ सू० ११) ४१
    त्रिषु चतुर्थं तैलवत् आसेच्यम् (वि० ३ सू० २०) ५९
    दानमात्मज्ञानं (वि० ३ सू० २८)
    भूतसंधानभूतपृथक्त्वं (वि० १ सू० २०) ३०
    विद्यासंहारे तदुत्थ० (वि० २ सू० १०) .
    शरीरवृत्तिवृत्तम् (वि० ३ सू० २६) ६७
    ३३. शिवसूत्रवार्त्तिक (भट्टभास्करविरचित)
    चैतन्यमात्मनो रूपं (१६।१।१) १
    ३४. सर्वमङ्गलातन्त्र
    शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव० ३४
    ३५. स्पन्दकारिका (भट्टकल्लट)
    अवस्थायुगलं चात्र० (सू० १४) ५३
    कार्योन्मुखः प्रयत्नोऽयं० (सू० १५, १६) ५४
    तेन शब्दार्थचिन्तासु० (सू० १९) २
    न दुःखं न सुखं यत्र० (सू० ५) ५५
    प्रबुद्धः सर्वदा तिष्ठेत् ० (सू० ३८) २२
  • ८० -
    पृष्ठ
    भोक्तैव भोग्यभावेन० (सू० २९) ५४
    यदा क्षोभः प्रलीयेत० (सू० ९) २१
    ३५. स्वच्छन्द तन्त्र
    अहमेवपरो हंसः ४९
    उद्बोधितो यथा वह्निः० (१० प० ३७१ श्लो०) ७१
    त्रिगुणेन तु जप्तेन० (६ प० ५४ श्लो०) ५७
    पाशावलोकनं त्यक्त्वा० (४ प० ४३४ श्लो०) ३३
    यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव० (४ प० ३१३ श्लो०) ४५
    यस्य ज्ञेयमयो भावः० (४ पू० ३१२ श्लो०) ४५
    विषयेषु च सर्वेषु इन्द्रियार्थेषु० (४ प० ३१४ श्लो०) ४५
    समनान्तं वरारोहे० (४ प० ४३२ श्लो०) ३३
    सर्वतत्वानि भूतानि० (७ प० २४५ श्लो०) ३६
    सुप्रदीप्ते यथा वह्नौ० (४ प० ३९८ श्लो०) ४७
    ३७. श्रीमत् स्वामी लक्ष्मण जू
    There is a point twixt sleep and waking. ६३
    ३८. श्रुति वाक्य
    तत्सृष्ट्वा तस्मिन्नेव प्राविशत् ५४
    न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति० (छां० उ० ४-४-६) २५
    प्रारब्धकर्मणां भोगादेव क्षयः ४६
    शरवत्संहितो भवेत् १९
    सर्वमिदमहं च ब्रह्मैव
    ३९. विविध
    अज्ञानैकघनो नित्यं० ५६
    अयं रसो येन मनागवाप्तः०
    तावद्वै ब्रह्मवेगेन न० ४
    दर्शनात्स्पर्शनाद्वापि०
    ....न तु ऋजुत्वं शुष्कवृक्षवत् ० ३८
    यत्र यत्र मिलिता मरीचयः० ३५
    यैवचित् गगनाभोगे ५८
    शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं ५१
    सुखे दुःखे विमोहे च स्थितः० ८

सूत्र के अनुसार

शिवसूत्र-विमर्श
शुद्धि-अशुद्धि पत्र
पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
७ १४ ६ठा कैवल्योपनिषद् कठोपनिषद्
८ २९ ३रा होकर हाकर
१० १९ १ला देहादि देहाहि
१५ ३ ३रा वह बह
१८ ३३ १ला विद्यासमुत्थान वद्यासमुत्थान
१९ ९ ३रा (१२-६) (२२-६)
१९ १४ ८वां अनुकरण अनुसरण
२० २१ ८वां " .,
२१ २१ ३रा १८ २८
२१ २२ ६ठा निर्मुक्त विमुक्त
२७ ३० ७वां युक्तियों व्यक्तियों
२८ ५ १३वां शक्ति व्यक्ति
२८ १५ ४था योगी योगो
२८ १९ ५वां १२८ २२८
२८ १९ ७वां १६-१९ २६-२९
२९ ४ ४था पंच प्रवाहों पंच
३३ २० ३रा हेतुरूपिणी सेतुरूपिणी
३७ २६ ४था विभाव्यते विभाज्यते
४१ ९ १३वां द्वार द्वारा
४४ ५ १५वां 'विद्यासंहारे तदुत्थ- उसे... तुर्यावस्था
स्वप्नदर्शनम्' (२-
१०)—शुद्ध विद्या के
लोप होने पर उस से
उत्पन्न भेदमय प्रपञ्च
में डूबता है—इस
सूत्र के अनुसार

  • ८२ -
    पृष्ठ पंक्ति शब्द शुद्ध अशुद्ध
    ४६ ४ ७वां भली भला
    ५१ ४ ७वां समर्थ) (समर्थ)
    ५७ २६ ६ठा गुणता का गुणता
    ६० २६ ६ठा को का
    ६० २८ १ला लेहनामन्थनाकोटैः लेहनामन्थनाकोटौ
    ६० २९ १ला शक्त्याभावेऽपि शक्ताभावेऽपि
    ६२ १३ ९वां मल— मल-
    ६२ १५ १ला हटने हटाने
    ६२ २१ २रा × आप
    ६२ २१ ५वां आप चित्स्वरूप चित्स्वरूप
    ६३ (नोट १.)४ ९वां hideous hidepus
    ६३ ( ,, )६ ८वां throttle toeerate
    ६३ ( ,, )७ Missing All those shalt. —
    thou toierate
    ६५ ३० ९वां × जैसे
    ६७ १ ७वां सद्गुरु सद्गुण
    ६८ (नोट १)४ ३रा स्वपितराः स्वपितरः
    ७१ नोट १ के साथ यह प्रमाण श्लोक जोड़ लेना चाहिए—
    अयं रसो येन मनागवाप्तः स्वच्छन्दचेष्टानिरतस्य तस्य ।
    समाधियोगव्रतमन्त्रमुद्रा जपादिचर्या विषवद्विभाति ॥
    अर्थ—वह परम-शिव भाव में रस-रत्ता मगन-मत्ता रहता है । इस निरपेक्ष
    भाव में अब चिन्तन के लिए बैठना, नौरात्रादिव्रत, नियन्त्रणार्थ मुद्राएँ तथा
    प्रार्थनादि उसे विष जैसे लगते हैं।
    ७२ ३० १०वां चैतन्यमात्मा चैत्यमात्मा
    ७३ ११ सूत्र ८ स्वतोऽनुभवात् स्वतोऽनुवात्
    ७३ १७ सूत्र १४ चित्तस्थितिवच्छरीर चित्तस्थितिवच्छरो
    ७४ ६ सूत्र ३१ सत्त्व-सिद्धिः सहैव-सिद्धिः
    ७४ २३ सूत्र ४८ मात्रस्वप्रत्ययसंधाने मात्रास्वरूपप्रत्यसंधाने
    ७६ ४१ १ला प्रविशेत्तत्स्वचेतसा प्रविशोत्तत्स्वचेतसा

This page is blank and contains no text to transcribe.

अन्य कृतियाँ:-
स्पन्दकारिका
नीलकंठ गुरुटु
शिवशक्तिसामरस्य सदाशिवतत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक सारे जड़चेतनात्मक विश्व का आधारभूत
एवं यथार्थ स्वरूप है। स्पन्दशास्त्र के पारिभाषिक शब्दों में इसी को चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता भी
कहते हैं। इस सामरस्य में शिव प्रकाश है और शक्ति उसका विमर्श है। वास्तव में यह नीरक्षीरात्मक
सामरस्य है। विमर्श प्रकाश की स्पन्दना है और स्पन्दना होने के कारण प्रकाश का प्राण है।
फलतः प्रकाश-रूप शिव की निजी अभिन्न अहंविमर्शरूपा शक्ति ही स्पन्द है।
संस्कृत भाषा से अपरिचित किन्तु सत्शास्त्रों में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए मूल सूत्रों और
वृत्ति का हिन्दी अनुवाद इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है।
परात्रिंशिका
नीलकंठ गुरुटु
काश्मीर शैवदर्शन में परात्रिंशिका का कितना महत्त्वपूर्ण स्थान है, यह इसी से ज्ञात हो जाता है कि
सोमानन्द, भवभूति, कल्याण, अभिनवगुप्त, लक्ष्मीराम तथा लासक जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने इसकी
व्याख्याएँ की हैं। इन सबमें अभिनवगुप्त कृत विवरण सर्वाधिक विस्तृत और ग्रन्थ का रहस्य स्पष्ट
करने के लिए अत्युपयुक्त माना गया है।
त्रिकदर्शन के मर्मज्ञ विद्वान श्री नीलकण्ठ गुरुटु ने इस विवरण की हिन्दी में सर्वप्रथम व्याख्या
की है। यह अनुवाद मात्र नहीं, विस्तृत व्याख्या है, जिसमें ग्रन्थ की सारी ग्रन्थियाँ खोलकर रख दी
गई हैं; जहाँ कहीं गूढ़ता रह गई थी, उसे टिप्पणियों में स्पष्ट कर दिया गया है। मूल-पाठ में
विभिन्न टीकाओं में जो विसंगतियाँ थीं, उन्हें भी कई टीकाओं और पाण्डुलिपियों के आधार पर
शुद्ध कर दिया गया है।
प्रत्यभिज्ञाहृदयम्
जयदेव सिंह
विश्व के कदाचित् प्राचीनतम धर्म-शैव धर्म की मुख्य विधाओं में से एक-कश्मीर का अद्वैत
शैव दर्शन-प्रस्तुत ग्रन्थ का विषय है जिसमें शैव सिद्धान्तों की विशद् व्याख्या की गई है। इसमें
क्षेमराज ने समस्त प्रत्यभिज्ञादर्शन का सार प्रस्तुत किया है।
प्रत्यभिज्ञादर्शन समझने के लिए प्रत्यभिज्ञाहृदयम् ठीक उसी प्रकार उपयोगी है जैसे वेदान्तदर्शन
समझने के लिए 'वेदान्तसार'। उपोद्घात, पारिभाषिक व दुरूह शब्दों पर टिप्पणियाँ और प्रतिपादित
विषयों का संक्षिप्त सार पुस्तक की मुख्य विशेषताएँ हैं।
मोतीलाल बनारसीदास
दिल्ली • मुम्बई • चेन्नई • कोलकाता
बंगलौर • वाराणसी • पुणे • पटना
E-mail: [email protected]
Website: www.mlbd.com
मूल्यः रु० ५० कोड : 27694
ISBN 81-208-2769-4
9788120827691