शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयपटलः । ( ३९ )
प्रसन्नतापूर्वक अपने मण्डलसे इडाके रन्ध्रमार्गसे आ-
यके देहीका पोषण करते हैं॥ ८ ॥ ९ ॥
मूलम्-मेरुमूले स्थितः सूर्यः कलाद्वादशसं-
युतः॥ दक्षिणे पथि रश्मिभिर्वहत्यूर्ध्वं प्र-
जापतिः ॥ १० ॥
टीका-मेरुदण्डके मूलमें अर्थात् नीचे बारह कला-
संयुक्त सूर्य स्थित हैं दक्षिणपथ अर्थात् पिङ्गलानाडी
द्वारा प्रजापति स्वरूपकी गति ऊपरको है ॥ १० ॥
मूलम्-पीयूषरश्मिनिर्यासं धातूंश्च ग्रसति
ध्रुवम् ॥ समीरमण्डले सूर्यो भ्रमते सर्व-
विग्रहे ॥ ११ ॥
टीका-सूर्य अमृतधातुको अपने किरण शक्तिसे
ग्रास करजातेहैं और वायुमण्डलके साथ सब शरीरमें
भ्रमण करतेहैं ॥ ११ ॥
मूलम्-एषा सूर्यपरामूर्तिर्निर्वाणं दक्षिणे प-
थि ॥ वहते लग्नयोगेन सृष्टिसंहारका-
रकः ॥ १२ ॥
टीका-यह सूर्यकी अपर निर्वाण मूर्ति है अर्थात्
पिङ्गलानाडी दक्षिणभागमें स्थितहै सूर्य सृष्टिसंहार
करता लग्नयोगसे नाडीद्वारा प्रवाह करतेहैं ॥ १२ ॥