शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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टीका-हे देवि ! अब उत्तम मन्त्रसाधन हम कहते हैं
जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानमें साधक
आनन्दपूर्वक सुख भोगेगा ॥ २३७ ॥
मूलम्-यस्मिन्मन्त्रे वरे ज्ञाते योगसिद्धिर्भ-
वेत्खलु ॥ योगेन साधकेन्द्रस्य सर्वैश्वर्य-
सुखप्रदा ॥ २३८ ॥
टीका-यह उत्तम मन्त्रके ज्ञान होनेसे निश्चय योग
सिद्ध होता है साधकेन्द्रको यह योग सर्व ऐश्वर्य सुखका
दाता है ॥ २३८ ॥
मूलम्-मूलाधारेस्ति यत्पद्मं चतुर्दलसम-
न्वितम् ॥ तन्मध्ये वाग्भवं बीजं विस्फु-
रन्तं तडित्प्रभम् ॥२३९॥ हृदये कामबी-
जंतु बन्धूककुसुमप्रभम् ॥ आज्ञारविन्दे
शक्त्याख्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम्॥२४०॥
बीजत्रयमिदं गोप्यं भुक्तिमुक्तिफलप्र-
दम् ॥ एतन्मन्त्रत्रयं योगी साधयेत्सि-
द्धिसाधकः ॥ २४१ ॥
टीका-जो मूलाधार चतुर्दलसंयुक्त पद्म है उसमें
विद्युतके समान प्रभायुक्त वाग्बीजकी स्थिति है और
हृदयकमलमें बन्धूकपुष्पके समान प्रभायुक्त कामबी-