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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 199

पंचमपटलः । ( १९५ )
मात्र कर्म करनेसे कदापि दोष नहीं है ॥२३२॥२३३॥
मूलम्-एवं निश्चित्य सुधिया गृहस्थोपि
यदाचरेत् ॥ तदा सिद्धिमवाप्नोति नात्र
कार्या विचारणा ॥ २३४ ॥
टीका-इसी प्रकार निश्चयबुद्धिसे यदि गृहस्थभी
योगअभ्यास करे तो वह अवश्य सिद्धि लाभ करेगा
इसमें संशय नहीं है ॥ २३४ ॥
मूलम्-पापपुण्यविनिर्मुक्तः परित्यक्ताङ्गसा-
धकः॥यो भवेत्स विमुक्तः स्याद्गृहे ति-
ष्ठन्सदा गृही ॥ २३५ ॥ न पापपुण्यैर्लि-
प्येत योगयुक्तो यदा गृही ॥ कुर्वन्नपि
तदा पापान्स्वकार्ये लोकसंग्रहे ॥२३६॥
टीका-जो साधक पाप पुण्यसे निर्लिप्त इन्द्रियस-
गत्यागी है सोई गृही साधक गृहमें रहके मुक्त है योग-
युक्त गृही पाप पुण्यमें बद्ध नहीं होता यदि संसारके
संग्रहमें पापभी करेगा तो वह पाप उसको स्पर्श न
करेगा ॥ २३५ ॥ २३६ ॥
मूलम्-अधुना संप्रवक्ष्यामि मन्त्रसाधन-
मुत्तमम् ॥ ऐहिकामुष्मिकंसुखं येन स्या-
दविरोधतः ॥ २३७॥