शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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विवर्जितः ॥२३०॥ त्याज्यते त्यज्यते स-
ङ्गं सर्वथा त्यज्यते भृशम्॥अन्यथा न ल-
भेन्मुक्तिं सत्यं सत्यं मयोदितम् ॥२३१॥
टीका-बुद्धिमान् साधक सभामें साधुके समान
थोडा और प्रमाण वाक्य बोले और शरीरके रक्षार्थ
थोडा भोजन करे और संगको सर्व प्रकारसे तजदे
कदापि किसीके संगमें लिप्त न होय हे पार्वति ! और
दूसरे प्रकार कदापि मुक्ति नहीं पावेगा यह हम सर्वथा
सत्य कहते हैं इसमें संशय नहीं है ॥२३० ॥ २३१ ॥
मूलम्-गुह्यैव क्रियतेऽभ्यासः संगं त्यक्त्वा
तदन्तरे ॥ व्यवहाराय कर्तव्यो बाह्यसं-
गो न रागतः ॥ २३२ ॥ स्वे स्वे कर्मणि
वर्तन्ते सर्वे ते कर्मसम्भवाः॥निमित्तमात्रं
करणे न दोषोस्ति कदाचन ॥ २३३ ॥
टीका-साधक संगरहित होके एकान्त स्थानमें
योगसाधन करे यदि संसारी मनुष्योंसे व्यवहार वर्त-
नेकी इच्छा करे तो अन्तर प्रीतिरहित होके , बाह्यसंग
करे और अपना आश्रम धर्म कर्मभी इसी प्रकार कर-
ता रहे इस हेतुसे कि, ज्ञानादि यावत् कर्म हैं सब कर्मा-
नुसार होते हैं फलइच्छारहित होके केवल निमित्त