शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १९३ )
टीका-हठयोगके बिना राजयोग और राजयोगके
बिना हठयोग सिद्ध नहीं होता इस हेतुसे योगीको
उचित है कि, योगवेत्ता सद्गुरूद्वाग हठयोगमें प्रवृत्त
हो ॥ २२७ ॥
मूलम्-स्थिते देहे जीवात् च योगं न श्रि-
यते भृशम् ॥ इन्द्रियार्थोपभोगेषु स जी-
वति न संशयः ॥ २२८ ॥
टीका-जो मनुष्य इस शरीरसे योगका आसङ्ग
नहीं ग्रहण करते हैं वह केवल इंद्रियोंके भोग भोगनेके
अर्थ संसारमें जीते हैं इसमें संशय नहीं है ॥ २२८ ॥
मूलम्-अभ्यासपाकपर्यन्तं मितान्नं स्मर-
णं भवेत् ॥ अन्यथा साधनं धीमान्कर्तुं
पारयतीह न ॥ २२९ ॥
टीका-बुद्धिमान् साधक योगे अभ्यासके आरंभसे
अभ्याससिद्धिपर्यंत मिताहारी रहे अर्थात् प्रमाणका
भोजन करे अन्यथा अर्थात् अप्रमाण भोजन करनेसे योग
अभ्यासके पार न होगा अर्थात् सिद्ध न होगा ॥ २२९ ॥
मूलम्-अतीवसाधुसंलापं साधुसम्मति-
बुद्धिमान्॥करोति पिण्डरक्षार्थं बह्वालाप-