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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 196

( १९२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मूलम्-एवमभ्यासतो नित्यं स्वप्रकाशं प्र-
काशते ॥ श्रोतुं बुद्धिसमर्थार्थं निवर्तन्ते
गुरोर्गिरः ॥ तदभ्यासवशादेकं स्वतो ज्ञा-
नं प्रवर्तते ॥ २२५ ॥
टीका-इसी प्रकार नित्य अभ्यास करनेसे साधक-
को आपही ज्ञानका प्रकाश होगा तब गुरुके वचनकी
निवृत्ति होगी अर्थात् गुरुके उपदेशका अंत हो जा-
यगा जब इतरवाक्य श्रवण करनेकी इच्छा निवृत्त
होजायगी तब यह योगअभ्यासद्वारा आपही एक
अद्वैतज्ञानमें प्रवृत्ति होगी ॥ २२५ ॥
मूलम्-यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मन-
सा सह॥ साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति
तद्भवम् ॥ २२६ ॥
टीका-यह ब्रह्म किसी प्रकार प्राप्त नहीं होता मन
वाक्यकाभी गमन नहीं है परन्तु यह योगसाधनसे आ-
पही निर्मल ज्ञान प्रकाश होता है ॥ २२६ ॥
मूलम्-हठं विना राजयोगो राजयोगं विना
हठः ॥ तस्मात्प्रवर्तते योगी हठे सद्गुरु-
मार्गतः ॥ २२७ ॥