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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 216 में से

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पृष्ठ 168

( १६४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत ।
पित है इसके चिंतनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ
होताहै ॥ १३० ॥ १३१ ॥
मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंगं तदाहं मुक्तिदा-
यकः ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो
भवति ध्रुवम् ॥ १३२ ॥
टीका-हे पार्वती ! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग
हमीं मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र निश्चय
हमारे तुल्य होजायगा ॥ १३२ ॥
मूलम्-इडा हि पिंगला ख्याता वरणासीति
होच्यते ॥ वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना-
थोत्र भाषितः ॥ १३३ ॥
टीका-इस शरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना-
डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और
असीके मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विराजमान हैं. ता-
त्पर्य यह है कि , यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो
स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै ॥ १३३ ॥
मूलम्-एतत्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृषिभिस्त-
तत्त्वदर्शिभिः ॥ शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं
तत्त्वं सुभाषितम् ॥ १३४ ॥
टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद-