शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 169, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १६५ )
र्शी ऋषिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम-
तत्त्व कहाहै ॥ १३४ ॥
मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य-
तोऽस्ति वै ॥ ततश्चैषा परावृत्त्य तदाज्ञा-
पद्मदक्षिणे ॥ १३५ ॥ वामनासापुटं या-
ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६ ॥
टीका-सुषुम्नानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्ध्र है
उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके
लौटीहै और आज्ञाचक्रके दक्षिणभाग होके वामनासापु-
टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥
मूलम्--ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पद्मं सहस्रारं व्यव-
स्थितम्॥तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च-
न्द्रो व्यवस्थितः ॥१३७॥ त्रिकोणाकार-
तस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम्॥इडाया-
ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः॥१३८॥
अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम् ॥
वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो-
गिभिः ॥ १३९ ॥
टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पद्मके
कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है