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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 216 में से

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पृष्ठ 166

( १६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
वशो भवेत् ॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प-
ते नात्र संशयः ॥ १२५ ॥
टीका-यह विशुद्धपद्ममें जब योगी मन और प्रा-
णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर
त्रैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं ॥१२५॥
मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवायाति
लयं यदा ॥ तदा बाह्यं परित्यज्य स्वा-
न्तरे रमते ध्रुवम् ॥ १२६ ॥
टीका-यह कमलमें साधकका मन दैवात् जब
लय होताहै तब सकल बाह्यविषयको त्यागके योगी-
का मन और प्राण शरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण
करताहै ॥ १२६ ॥
मूलम्-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य
शक्तिः ॥ संवत्सरसहस्रेऽपि वज्रातिक-
ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त-
द्ध्यानं योगींद्रोऽवनिमण्डले ॥ तदा वर्ष-
सहस्राणि मन्यते तत्क्षणं कृती ॥ १२८ ॥
टीका-उस योगीका शरीर वज्रसेभी कठोर होजा-
ताहै और उसको स्वशरीरकी शक्तिसे किसीप्रकारकी
हानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाधिके पीछे जब