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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 165

पंचमपटलः । ( १६१ )
अथ विशुद्धचक्रविवरणम् ।
मूलम्-कण्ठस्थानस्थितं पद्मं विशुद्धं नाम-
पञ्चमम् ॥ १२२ ॥ सुहेमाभं स्वरोपेतं
षोडशस्वरसंयुतम् ॥ छगलाण्डोऽस्ति
सिद्धोत्र शाकिनी चाधिदेवता ॥ १२३ ॥
टीका-कंठस्थानमें जो पांचवां विशुद्धनामक क-
मल है वह स्वर्णके समान कांतिसे शोभित है और सो-
लह स्वर अर्थात् अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ॠ-ऌ-ॡ-ए-ऐ-
ओ-औ-अं-अः-से युक्त है और छगलांड सिद्ध और शा-
किनीदेवी अधिष्ठात्री और जीवात्मा देवता इस स्थान-
में सदा विराजमान हैं ॥ १२२ ॥ १२३ ॥
मूलम्-ध्यानं करोतियो नित्यं स योगीश्व-
रपण्डितः॥ किन्त्वस्य योगिनोऽन्यत्र वि-
शुद्धाख्ये सरोरुहे ॥ चतुर्वेदा विभासन्ते
सरहस्या निधेरिव ॥ १२४ ॥
टीका-जो पुरुष इस विशुद्धपद्मका नित्य ध्यान
करतेहैं सो योगीश्वर पंडित हैं और इस विशुद्धपद्ममें
उस पुरुषको चारोंवेद रहस्यसहित समुद्रके रत्नवत्
प्रकाश होते हैं ॥ १२४ ॥
मूलम्-इहस्थाने स्थितो योगी यदा क्रोध-