सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

पंचमपटलः ।
( १५३ )
चः॥इदं ध्यानं सदा कार्यं पवनाभ्यासि-
ना परम् ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मु-
च्यते सर्वकिल्बिषात् ॥ ९५ ॥
टीका-गुरुका वचन जग मृत्यु आदि जो दुःखका
समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको
यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे
योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै ॥ ९५ ॥
मूलम्-मूलपद्मं यदा ध्यायेद्योगी स्वायं-
म्भुलिङ्गकम् ॥ तदा तत्क्षणमात्रेण पापौ-
घं नाशयेद्ध्रुवम् ॥ ९६ ॥
टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु-
क्तका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्चय पापके समूहका
नाश करदेगा ॥ ९६ ॥
मूलम्-यं यं कामयते चित्ते तं तं फलमवा-
प्नुयात् ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति
विमुक्तिदम् ॥९७॥ बहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू-
जनीयं प्रयत्नतः ॥ ततः श्रेष्ठतमं ह्येतन्ना-
न्यदस्ति मतं मम ॥ ९८ ॥
टीका--जो साधक मूलाधार पद्मका ध्यान करते हैं
वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सो