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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 216 में से

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पृष्ठ 158

( १५४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
सर्व वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक
यह अभ्यास करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय मुक्ति-
दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति ! इससे श्रेष्ठतम
दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहै ॥ ९७ ॥ ९८ ॥
मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यक्ता बहिःस्थं
यः समर्चयेत् ॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य
भ्रमते जीविताशया ॥ ९९ ॥
टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके बाहरके
देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके
रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९ ॥
मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि-
ने दिने ॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिर्नात्र
कार्या विचारणा ॥ १००॥ निरन्तरकृता-
भ्यासात्षण्मासैः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ तस्य
वायुप्रवेशोपि सुषुम्णायाम्भवेद्ध्रुवम् ॥
॥ १०१ ॥ मनोजयञ्च लभते वायुबिन्दु-
विधारणात् ॥ ऐहिकामुष्मिकीसिद्धिर्भ-
वेन्नैवात्र संशयः ॥ १०२ ॥
टीका-जो आलस्यको त्यागके शरीरस्थ परमा-
त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-