शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेढ्रान्त-
रालगा ॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति
कुण्डली सदा ॥ ७९ ॥ संवेष्ट्य सकला
नाडीः सार्द्धत्रिकुटिलाकृतिः॥ मुखे निवे-
श्य सा पुच्छं सुषुम्णाविवरे स्थिता॥८०॥
टीका-गुदा और मेढ्रके मध्यमें जो योनि है वह
पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें
कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलिनीकी स्थिति है
यह कुण्डलिनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा
कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा
विवरमें स्थित है ॥ ७९ ॥ ८० ॥
मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फुरन्ती
प्रभया स्वया ॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना
वाग्देवी बीजसंज्ञिका ॥ ८१ ॥
टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता
अपनी प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदृश संधि-
में स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे
वाक्य उच्चारण होताहै और बीज संज्ञक है अर्थात् सं-
सारकी बीज है ॥ ८१ ॥
मूलम्-ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण