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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 145

पंचमपटलः । ( १४१ )
मूलम्-सिद्धेस्तदाविर्भवति सुखरूपी निर-
ञ्जनः ॥ तस्मिन्परिश्रमः कार्यो येन सि-
द्धो भवेत्खलु ॥ ५५ ॥
टीका-यह योग सिद्ध होनेसे साधकके हृदयमें
सुखरूपी निरंजन परब्रह्म चैतन्यस्वरूपका प्रकाशहोगा
इस हेतुसे यह योगमें साधकको परिश्रम कर्तव्य है,
इससे निश्चय यह योग सिद्ध होजायगा ॥ ५५ ॥
मूलम्-यः करोति सदाभ्यासं तस्य सिद्धि-
र्न दूरतः ॥ वायुसिद्धिर्भवेत्तस्य क्रमादेव
न संशयः ॥ ५६ ॥
टीका-जो मनुष्य इस योगका सर्वदा अभ्यास करे-
गा उसको सर्वसिद्धि प्राप्त होगी और निश्चय आपही
क्रमसे वायु सिद्ध होजायगा ॥ ५६ ॥
मूलम्-सकृद्यः कुरुते योगी पापौघं नाशये-
द्ध्रुवम् ॥ तस्य स्यान्मध्यमे वायोः प्रवेशो
नात्र संशयः ॥ ५७ ॥
टीका-जो योगी प्रतिदिन एकवार यह अभ्यास
करे तो उसके सर्व पापोंका नाश होजायगा और उसका
प्राणवायु निश्चय सुषुम्णामें प्रवेश करेगा ॥ ५७ ॥
मूलम्-एतदभ्यासशीलो यः स योगी देव-