सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

( १४२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
पूजितः ॥ अणिमादिगुणाँल्लब्ध्वा विचरे-
द्भुवनत्रये ॥ ५८ ॥
टीका-यह अभ्यासशील योगी देवतोंसे पूजित है
और अणिमादिक सिद्धि लाभ करके तीनों लोकमें
इच्छापूर्वक विचरेगा ॥ ५८ ॥
मूलम्-यो यथास्यानिलाभ्यासात्तद्वेत्त-
स्य विग्रहः ॥ तिष्ठेदात्मनि मेधावी संयतः
क्रीडते भृशम् ॥ ५९ ॥
टीका-जिस प्रकार वायुका अभ्यास करेगा उसी
तरह साधकका शरीर सिद्ध हो जायगा और बुद्धिमान
पुरुष आत्मामें स्थितहोके सर्वदा क्रीडा करेगा ॥ ५९ ॥
मूलम्-एतद्योगं परं गोप्यं न देयं यस्य
कस्यचित् ॥ यःप्रमाणैः समायुक्तस्तमेव
कथ्यते ध्रुवम् ॥ ६० ॥
टीका--यह योग परमगोपनीयहै अनधिकारीको
कदापि देनेके योग्य नहीं है परन्तु प्रमाणयुक्त अर्थात्
पूर्वोक्त लक्षणयुक्त साधकको अवश्य देना उचितहै॥६०॥
मूलम्-योगी पद्मासने तिष्ठेत्कण्ठकूपे य-
दा स्मरन्॥जिह्वां कृत्वा तालुमूले क्षुत्पि-
पासा निवर्तते ॥ ६१ ॥