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शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 216 में से

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पृष्ठ 144

( १४० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-योगग्रहणके समय बुद्धिमान् साधक ब्राह्म-
णको सन्तोष करके अर्थात् द्रव्यादिक प्रदानपूर्वक
प्रसन्न करके अनेक आशीर्वाद श्रवण करके पवित्रता
से शिवमन्दिरमें बैठके आत्माके अर्थ जो यह शुभयोग
है इसको ग्रहणकरे ॥ ५२ ॥
मूलम्-संन्यस्यानेन विधिना प्राक्तनं
विग्रहादिकम् ॥ भूत्वा दिव्यवपुर्योगी
गृह्णीयाद्वक्ष्यमाणकम् ॥ ५३ ॥
टीका-साधक इस विधानसे पूर्व शरीर गुरुकी कृ-
पासे त्यागके दिव्य शरीर होके जो आगे कहेंगे वह
योग ग्रहण करे. तात्पर्य यह है कि, योगग्रहणके समयसे
साधकका शरीर दिव्य होजाताहै व्याधि और अज्ञान-
का शरीर नहीं रहजाता इस हेतुसे योगग्रहणके समय
साधक यह चिंतनकरे कि, पूर्व शरीरको हमने त्यागके
दिव्यशरीर धारण किया ॥ ५३ ॥
मूलम्-पद्मासनस्थितो योगी जनसंगविव-
र्जितः ॥ विज्ञाननाडीद्वितयमङ्गुलीभ्यां
निरोधयेत् ॥ ५४ ॥
टीका-योगी संगरहित पद्मासनमें स्थित होके दो-
नों विज्ञाननाडी अर्थात् इडा और पिंगलाको दो अंगु-
लीसे निरोध करे ॥ ५४ ॥