सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 122

( ११८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
कारण है और मूढलोगोंके मूढताका और जरामरण
शील लोगोंका अर्थात् सबका यही विन्दु हेतु है योगी
लोगोंके प्रति यह हमारा उत्तम योग है ॥ ९१ ॥ ९२ ॥
मूलम्-अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति भोगयु-
क्तोऽपि मानवः ॥ सकलः साधितार्थोपि
सिद्धो भवति भूतले ॥ ९३ ॥
टीका-भोगयुक्त मनुष्योंकोभी अभ्याससे सिद्धि
प्राप्त होतीहै और सकल वाञ्छितफल संसारमें सिद्ध
होजाते हैं ॥ ९३ ॥
मूलम्-भुक्त्वा भोगानशेषान् वै योगेनानेन
निश्चितम् ॥ अनेन सकला सिद्धिर्योगिनां
भवति ध्रुवम् ॥ सुखभोगेन महता तस्मा-
देनं समभ्यसेत् ॥ ९४ ॥
टीका-इस योगअभ्यासद्वारा निश्चय अशेषभोग
भोगनेसे सुखी होगा और योगीलोगोंको इस वज्रो-
लीमुद्रासे सकल सिद्धी अवश्य प्राप्तहोती हैं और
महानसुख भोगते हुए यह साधना सिद्ध होगी इसलि-
ये इसका अभ्यास करना उचित है ॥ ९४ ॥
मूलम्-सहजोल्यमरोली च वज्रोल्या भेद-
तो भवेत् ॥ येन केन प्रकारेण बिन्दुं योगी
प्रधारयेत् ॥ ९५ ॥