शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 356 में से
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गिरा देता है, उसे 'भेदन' या फोड़ने वाला कहा जाता है,
जैसे-कुटकी।
रेचन द्रव्य का लक्षण
विपक्वं यदपक्वं वा मलादि द्रवतां नयेत् ।। ६ ।।
रेचयत्यपि तज्ज्ञेयं रेचनं त्रिवृता यथा।
जो द्रव्य पके हुये अथवा न पके हुये, मलादि को पतला
कर देता है और उसे निकाल भी देता है, उस द्रव्य को 'रेचन'
कहते हैं, जैसे-निसोत।
वक्तव्य-अनुलोमक, स्रंसक, भेदक और रेचक ये चारों
द्रव्य विरेचन (दस्त) कराते हैं। अतः इस प्रकार के सभी
द्रव्य 'दस्तावर' कहे जाते हैं।
वमन द्रव्य का लक्षण
अपक्वपित्तश्लेष्माणौ बलादूर्ध्वं नयेत् तु यत् ।। ७ ।।
वमनं तद्धि विज्ञेयं मदनस्य फलं यथा।
जो द्रव्य अपक्व (आमाशय स्थित आम आहार को
भी) या न पके हुये पित्त एवं कफ को बलपूर्वक ऊपर
(मुखमार्ग) से बाहर निकाल देता है। वह वमन कहा जाता
है, जैसे-मैनफल।
वक्तव्य-वमन द्रव्य उलटी या कै कराते हैं।
शोधन द्रव्य का लक्षण
स्थानाद् बहिर्नयेदूर्ध्वमधो वा मलसञ्चयम् ।। ८ ।।
देहसंशोधनं तत् स्याद् देवदाली फलं यथा।
जो द्रव्य मलों को उनके स्थान से मुखमार्ग अथवा गुदमार्ग
द्वारा बाहर निकाल देता है, वह देहसंशोधन या 'शोधन' कहा
जाता है, जैसे-देवदाली फल।
वक्तव्य-यह द्रव्य उलटी और दस्त दोनों कराता है।
शोधन पाँच प्रकार से होता है-1. निरूहण वस्ति से, 2. वमन
से, 3. विरेचन से, 4. शिरोविरेचन से तथा 5. सिरावेध आदि
विधियों द्वारा रक्त निकालने से।
छेदन द्रव्य का लक्षण
श्लिष्टान् कफादिकान् दोषानुन्मूलयति यद् बलात् ।। ९ ।।
छेदनं तद्यथा क्षारा मरिचानि शिलाजतु।
जो द्रव्य सटे या चिपके हुये कफ आदि दोषों को बलपूर्वक
उखाड़ देता है, वह 'छेदन' या काटने वाला कहा जाता है,
जैसे-जौखार आदि क्षार, काली मिर्च और शिलाजीत।
लेखन द्रव्य का लक्षण
धातून् मलान् वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् ।। १० ।।
लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीरमुष्णं वचा यवाः।
जो द्रव्य सम्पूर्ण शरीर की धातुओं और मलों को सुखाकर
उखाड़ या छील कर निकाल देता है, वह 'लेखन' कहा जाता
है, जैसे-शहद, गरम जल, वच और जौ।
वक्तव्य-छेदन तथा लेखन ये दोनों द्रव्य शरीर के भीतर
जमे हुये दोषों को निकाल कर बाहर कर देते हैं।
ग्राही द्रव्य का लक्षण
दीपनं पाचनं यत् स्यादुष्णत्वाद् द्रवशोषकम् ।। ११ ।।
ग्राहि तच्च यथा शुण्ठी जीरकं गजपिप्पली।
जो द्रव्य दीपन (अग्निवर्द्धक) हो, पाचक हो तथा उष्ण
होने से द्रव (मल के पतलेपन) को सुखाने वाला हो, उसे
'ग्राही' कहते हैं जैसे-सोंठ, जीरा और गजपीपल।
स्तम्भन द्रव्य का लक्षण
रौक्ष्याच्छैत्यात् कषायत्वाल्लघुपाकाच्च यद्भवेत् ।। १२ ।।
वातकृत् स्तम्भनं तत् स्याद् यथा वत्सकटुण्डुकौ।
जो द्रव्य रूक्ष, शीत, कसैला और शीघ्रपाकी होने के
कारण वातवर्द्धक होता है, उसे 'स्तम्भन' कहते हैं, जैसे-कुरैया
की छाल और सोनापाठा।
वक्तव्य-ग्राही तथा स्तम्भन ये दोनों द्रव्य शरीर से बाहर
निकलने वाली वस्तुओं को भीतर ही रोक देते हैं।
रसायन द्रव्य का लक्षण
रसायनं च तज्ज्ञेयं यज्जराव्याधिनाशनम् ।। १३ ।।
यथाऽमृता रुदन्ती च गुग्गुलुश्च हरीतकी।
जो द्रव्य जरा (बुढ़ापा) और रोगों को नष्ट करता है, वह
'रसायन' कहा जाता है, जैसे-गिलोय, रुद्रवन्ती, गूगल और
हरड़।
वक्तव्य-कुछ लोगों में युवावस्था में ही बाल सफेद
होना, मुख या शरीर पर झुर्रियाँ पड़ना और इन्द्रियों का दुर्बल
होना आदि बुढ़ापे के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। रसायन
औषधियों के सेवन से इसी प्रकार का जरा (बुढ़ापा) भी नष्ट
होता है और स्वाभाविक जरा तो स्वाभाविक ही होता है और
आकर ही रहता है तथा जाता भी नहीं। 'लाभोपायो हि शस्तानां
रसादीनां रसायनम्'। च० चि० अ० 1.8।