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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 356 में से

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पृष्ठ 69

चतुर्थोऽध्यायः
दीपनपाचनादिकथनम्
दीपन-पाचन द्रव्यों के लक्षण
पचेन्नामं वह्निकृच्च दीपनं तद्यथा मिशिः।
पचत्यामं न वह्निं च कुर्याद् यत्तद्धि पाचनम्।।1।।
नागकेशरवद् विद्याच्चित्रो दीपन-पाचनः।
जो द्रव्य (पदार्थ) आम को नहीं पकाता है, किन्तु अग्नि
(पाचनशक्ति या पाचक रसों को) बढ़ाता है, वह 'दीपन'
कहा जाता है, जैसे-सौंफ। और जो द्रव्य आम को पकाता है,
किन्तु अग्नि को नहीं बढ़ाता है वह 'पाचन' कहा जाता है,
जैसे-नागकेसर। जो द्रव्य दोनों कार्य करता है वह 'दीपन-
पाचन' कहा जाता है, जैसे-चित्रक।
वक्तव्य-जरा विचार कीजिये-जो द्रव्य दीपन अर्थात्
अग्निवर्द्धक है, वह आम को अवश्य पकायेगा फिर उसे
'पाचन' क्यों न माना जाये और इसी प्रकार जो द्रव्य 'पाचन'
कहा जाता है, वह अग्नि को बढ़ाए बिना कैसे आम को पका
सकेगा? ध्यान दें-जो द्रव्य केवल अग्नि को बढ़ाता है, वह
भले ही अग्नि को बढ़ाकर उसके द्वारा पाचन करता हुआ
'पाचन' कहा जा सकता है, किन्तु वह 'दीपन' ही कहा
जायेगा 'पाचन' नहीं, क्योंकि यदि कोई किसी से किसी
काम को करवाता है, तो वह सीधा 'कर्ता' नहीं कहा जा
सकता। वह 'कर्ता' तभी कहा जा सकेगा, जब वह स्वयं उस
काम को करेगा। अथवा इसे इस प्रकार समझें-चूल्हे में जो
लकड़ी डाली जाती है, वह 'दीपन' या 'अग्निवर्धक' कही
जा सकती है, वह पाचन नहीं, क्योंकि वह बादाम या सुपाड़ी
आदि द्रव्यों को तब तक नहीं पका सकती, जब तक उनमें
कोई क्षार न डाला जाये। इसी प्रकार लकड़ी 'दीपन' और
क्षार 'पाचन' कहा जायेगा।
शमन द्रव्य का लक्षण
न शोधयति यद्दोषान् समान्नोदीरयत्यपि।।2।।
समीकरोति विषमाञ्छमनं तद्यथाऽमृता।
जो द्रव्य सम (प्रकृतिस्थ) दोषों को न तो शरीर से बाहर
ही निकालता और न कुपित ही करता है, किन्तु बढ़े हुये
अथवा घटे हुये दोषों को जो सम या प्रकृतिस्थ कर देता है,
उसे 'शमन' कहते हैं, जैसे-'गुरुच'।
वक्तव्य-दोष का शमन सात प्रकार से होता है-1.
पाचन, 2. दीपन, 3. लंघन, 4. प्यासा रहने, 5. व्यायाम
करने, 5. आतप (धूप) सेवन एवं 7. वायु सेवन से।
अनुलोमन द्रव्य का लक्षण
कृत्वा पाकं मलानां यद्भित्त्वा बन्धमथो नयेत्।।3।।
तच्चानुलोमनं ज्ञेयं यथा प्रोक्ता हरीतकी।
जो द्रव्य मलों को पकाकर और उनके बन्ध (गाँठों) को
तोड़कर नीचे (गुदमार्ग से अथवा अपने मार्ग से) बाहर
निकाल देता है, उसे 'अनुलोमन' कहते हैं, जैसे-हरड़।
वक्तव्य-उलटे मार्ग में जाते हुये वातादि दोषों को
स्वमार्गगामी बनाने वाला द्रव्य भी 'अनुलोमन' कहा जाता
है।
संस्रन द्रव्य का लक्षण
पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्टं कोष्ठे मलादिकम्।।4।।
नयत्यधः संस्रनं तद् यथा स्यात् कृतमालकम्।
जो द्रव्य उदर में चिपके हुये पकाने योग्य (आम) मलादि
तो पकाये बिना (अपक्व को) ही गुदमार्ग से निकाल देता है,
उसे 'संस्रन' (सरकाने वाला) द्रव्य कहा जाता है, जैसे-
अमलतास की गुद्दी।
भेदन द्रव्य का लक्षण
मलादिकमबद्धं यद् बद्धं वा पिण्डितं मलैः ।।5।।
भित्त्वाधः पातयति तद् भेदनं कटुकी यथा।
जो द्रव्य ढीले अथवा बँधे हुये अथवा वात आदि दोषों
द्वारा पिण्डित (गाँठ बने हुये) मल को तोड़-फोड़कर नीचे