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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 356 में से

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पृष्ठ 66

30 शार्ङ्गधरसंहिता [पूर्वखण्डे
[बायाँ स्तम्भ]
वायु की अधिकता से मूत्र कुछ पीला, पित्त की अधिकता
से अत्यन्त पीला एवं नीला रक्त की अधिकता से लाल एवं
कफ की अधिकता से श्वेत और झाग से युक्त होता है।
वक्तव्य— रोगी के शरीर पर वायु आदि दोषों का प्रभाव
पड़ने से भिन्न-भिन्न प्रकार के परिवर्तन होते हैं। अतः
चिकित्सक का कर्तव्य है कि वह उन परिवर्तनों पर विशेष
रूप से ध्यान दे। रोग का निदान करते समय वह रोगी के
आँख, जीभ, तथा मल-मूत्र आदि को ध्यानपूर्वक देखकर
दोषों के बलाबल का निश्चय करे।
दूत-परीक्षा
दूताः स्वजातयोऽव्यङ्गाः पटवो निर्मलाम्बराः ।। 17 ।।
सुखिनोऽश्ववृषारूढाः शुभ्रपुष्पफलैर्युताः ।
सुजातयः सुचेष्टाश्च सजीवदिशि संश्रिताः ।। 18 ।।
भिषजं समये प्राप्ता रोगिणः सुखहेतवे ।
(यस्यां प्राणमरुद्वाति सा नाडी जीवसंयुता ।। 19 ।।)
जो दूत (रोगी का समाचार लेकर अथवा वैद्य को बुलाने
के लिए जो मनुष्य वैद्य के पास जाता है वह 'दूत' कहा जाता
है) रोगी के स्वजाति के हों, अंगहीन (काने, लंगड़े आदि) न
हों, चतुर हों, निर्मल वस्त्र धारण किये हों, घोड़े अथवा बैल
(भारतवर्ष में बैल पर सवारी नहीं की जाती, किन्तु भूटान
और तिब्बत आदि देशों में की जाती है) पर चढ़कर आये हों
स्वयं सुखी या स्वस्थ हों, वैद्यजी को अर्पण करने के लिए
श्वेत पुष्प अथवा फल साथ लिये हों, अच्छी जाति (रोगी की
अपेक्षा) के हों, अच्छी चेष्टा (व्यवहार) वाले हों, सजीव
दिशा में (सजीव दिशा वह होती है, जिस दिशा या ओर का
नासा-स्वर चल रहा हो) आकर बैठे हों और उचित समय
(जब वैद्य जी दूसरे कार्य में न लगे हों) पर वैद्य जी के पास
आये हों, वे रोगी के लिए सुखदायक होते हैं।
वक्तव्य— नासिका द्वारा जो श्वास वायु आता-जाता है
वह एक नासापुट से खुलासा और दूसरे से रुककर आता-जाता
है, एक समय दाएँ से खुलासा और बाएँ से रुककर, दूसरे
समय बाएँ से खुलासा और दाएँ से रुककर आता है; इसे
ध्यानपूर्वक देखें। दूत से सम्बन्धित अन्य बातें सु० सू० अ०
29 में तथा च० इ० अ० 12 में देखें।
दूत के शकुन
वैद्याह्वानाय दूतस्य गच्छतो रोगिणः कृते।
न शुभं सौम्यशकुनं प्रदीप्तं च सुखावहम् ।। 20 ।।
[दायाँ स्तम्भ]
वैद्य जी को बुलाने के लिए जाते हुये दूत को मार्ग में
यदि अच्छे सगुन दिखलायी दें तो वे रोगी के लिए अशुभ
होते हैं और बुरे सगुन हों तो रोगी के लिए अच्छे होते हैं।
वैद्य के शकुन
चिकित्सां रोगिणः कर्तुं गच्छतो भिषजः शुभम्।
यात्रेयं सौम्यशकुनं प्रोक्तं दीप्तं न शोभनम् ।। 21 ।।
रोगी को चिकित्सा करने के लिए जाते हुये वैद्य को मार्ग
में यदि शुभ शकुन प्रतीत हों तो (रोगी के लिए और वैद्य जी
के लिए भी) अच्छे होते हैं और अशुभ हों तो बुरे होते हैं।
चिकित्सा-योग्य रोगी के लक्षण
निजप्रकृतिवर्णाभ्यां युक्तः सत्त्वेन संयुतः।
चिकित्स्यो भिषजा रोगी वैद्यभक्तो जितेन्द्रियः ।। 22 ।।
जो रोगी अपने स्वभाव एवं वर्ण से युक्त हो, सत्त्व
(शारीरिक एवं मानसिक बल) से युक्त हो, वैद्य जी का भक्त
(आज्ञाकारी और श्रद्धालु) और जितेन्द्रिय (पथ्य रखने वाला)
हो, उसकी चिकित्सा करनी चाहिये।
वक्तव्य— उक्त श्लोक द्वारा रोगी की साध्यता का वर्णन
किया गया है। इसके विपरीत रोगी को असाध्य समझना
चाहिये। विशेष जानकारी के लिए-सु० सू० अ० 24, 30,
31, 32 और चरक-इन्द्रियस्थान देखें।
वैद्य का लक्षण
(तत्त्वाधिगतशास्त्रार्थो दृष्टकर्मा स्वयं कृती।
लघुहस्तः शुचिः शूरः सज्जोपस्करभेषजः ।। 23 ।।
प्रत्युत्पन्नमतिर्धीमान् व्यवसायी प्रियंवदः।
सत्यधर्मपरो यश्च वैद्य ईदृक् प्रशस्यते ।। 24 ।।)
जो शास्त्र के अर्थ एवं तात्पर्य को समझता हो, जिसने
औषध निर्माण आदि देखा हो, जो स्वयं कार्य करता हो,
शीघ्रकारी, पवित्र एवं उत्साही हो, जिसके पास औषधियाँ
तैयार हों, जिसको समय पर कार्यप्रणाली सूझ जाये, बुद्धिमान्,
लगन वाला, प्रियवादी, सत्यवादी तथा जो धर्मात्मा हो वह
वैद्य प्रशंसा के योग्य होता है।
परिचारक का लक्षण
(स्निग्धोऽजुगुप्सुर्बलवान् युक्तो व्याधितरक्षणे।
वैद्यवाक्यकृदश्रान्तो युज्यते परिचारकः ।। 25 ।।)
जो रोगी का स्नेही या प्रेमी हो, निन्दक न हो, बलवान्
हो, रोगी की सेवा में तत्पर हो, वैद्य के कथनानुसार कार्य करे
और थके नहीं, ऐसा 'परिचारक' योग्य होता है।