शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः ] नाडीपरीक्षादिविधिः 29
गति या धमन भी भिन्न-भिन्न होता है, जैसा कि उपर्युक्त
श्लोकों द्वारा कहा गया है। वस्तुतः धमनी का धड़कना हृदय
की धड़कन का सूचक है अर्थात् जितनी बार हृदय रक्त को
शरीर की ओर प्रेरित करता है, उतनी ही बार धमनी उभरती
हुई मालूम होती है। स्वस्थ एवं आराम से बैठे हुये मनुष्य की
धमनी प्रति मिनट (एक मिनट में) निम्न प्रकार फड़कती है।
जन्म से 5 मास तक प्रति मिनट 115 से 140 बार फड़कती है।
आयु एक मिनट में
6 मास से 1 वर्ष 115 से 105 बार
2 वर्ष से 6 वर्ष 105 से 90 बार
7 वर्ष से 10 वर्ष 90 से 80 बार
11 वर्ष से 14 वर्ष 80 से 75 बार
15 वर्ष से 60-70 वर्ष प्रायः 75 से 70 बार
70 वर्ष के पश्चात् 85 से 80 बार
आप किसी की धमनी के मन्द, स्थिर अथवा वेगवती
होने का निर्धारण इन आँकड़ों को मन में रखकर ही कर
सकेंगे। अतः इन्हें स्मरण रखना चाहिये और घड़ी देखते हुये
सावधान होकर धमनी की गतियों को गिन लेना चाहिये।
अधिकांश चिकित्सक नाड़ी देखकर रोग को पूर्णरूप से जान
लेने का प्रयत्न करते हैं और रोगी भी चाहते हैं, कि वैद्य
केवल नाड़ी देखकर सर्वथा रोग को जान लें और उनका
खाया-पिया भी बतला दें; यह कहाँ तक सम्भव है? इस बात
को बुद्धिमान् चिकित्सक तथा रोगी स्वयं समझ सकते हैं।
महर्षियों ने रोग-विनिश्चय के लिए अपनी सम्मति इस प्रकार
दी है- 'विदितवेदितव्यास्तु, भिषजः सर्वं सर्वथा यथासम्भवं
परीक्ष्यं परीक्ष्य अध्यवस्यन्तो, न क्वचिदपि विप्रतिपद्यन्ते
यथेष्टमर्थमभिनिर्वर्त्तयन्ति चेति'। अर्थात् विद्वान् वैद्य सम्पूर्ण
रोग को यथाशक्ति भली-भाँति निश्चित करते हुये कहीं भी
धोखा नहीं खाते और सफलता प्राप्त कर लेते हैं (च० चि०
अ० 7)। 'प्रत्यक्षतस्तु खलु रोगतत्त्वं बुभुत्सुः सर्वैरिन्द्रियैः
सर्वान् इन्द्रियार्थान् आतुरशरीरगतान् परीक्षेतऽन्यत्र रसज्ञानात्'।
(च० चि० अ० 4)। 'तस्योपलब्धिर्निदानपूर्वरूपलिङ्गोपश-
यसम्प्रातितः।' (च० नि० अ० 1) अर्थात् रोग को निदान,
पूर्वरूप, लक्षण, उपशय एवं सम्प्राप्ति से जानना चाहिये।
यही बात सु० सू० अ० 10 में तथा वाग्भट सू० अ० 1 में भी
कही गयी है। वस्तुतः कुशल चिकित्सक का कर्तव्य है कि
वह पाँचों ज्ञानेन्द्रियों तथा विविध प्रकार के तत्सम्बन्धित
प्रश्नों द्वारा रोग का निश्चय करे।
नेत्र-परीक्षा
(नेत्रं स्यात् पवनादूक्षं धूम्रवर्णं तथाऽरुणम् ।। 9 ।।
कोणं गतं प्रविष्टं च तथा स्तब्धविलोकनम्।
हरिद्राखण्डवर्णं वा रक्तं वा हरितं तथा ।। 10 ।।
दीपद्वेषि सदाहं च नेत्रं स्यात् पित्तकोषतः ।
चक्षुर्वलासबाहुल्यात् स्निग्धं स्यात् सलिलप्लुतम् ।। 11 ।।
तथा धवलवर्णं च ज्योतिर्हीनं मलान्वितम्।
नेत्रं द्विदोषबाहुल्यात् स्याद् दोषद्वयलक्षणम् ।। 12 ।।
त्रिदोषदूषितं नेत्रमन्तर्मग्नं भृशं भवेत् ।
त्रिलिङ्गं सलिलस्रावि प्रान्तेनोन्मीलयत्यपि ।। 13 ।।
इति नेत्रं परीक्षेत शेषं रोगानुरूपतः ।)
नाड़ी के समान नेत्र की भी परीक्षा करे। वायु की वृद्धि
से नेत्र रूक्ष, धूमिल तथा अरुण (कालापन लिये लाल)
होता है, कोने में गया हुआ तथा धँसा हुआ और स्तब्ध प्रतीत
होता है। पित्त के कोप से नेत्र हल्दी के वर्ण वाला, लाल
अथवा हरा दीप तथा प्रकाश का द्वेषी और दाहयुक्त होता है।
कफ की अधिकता से नेत्र चिकना, जल से भीगा हुआ श्वेत,
ज्योति से हीन तथा मैला होता है। दो दोषों की अधिकता से
दो दोषों के लक्षणों से युक्त होता है और तीनों दोषों से दूषित
नेत्र अत्यन्त धँसा हुआ एवं तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त
होता है और नेत्रों से पानी जाता है तथा नेत्र खुले ही रहते हैं।
यह दोषानुसार नेत्र-परीक्षा कही गयी है। शेष भिन्न-भिन्न
रोगों के लक्षणों पर ध्यान देना उचित है।
जिह्वा-परीक्षा
(शाकपत्रप्रभा रूक्षा स्फुटिता रसनाऽनिलात् ।। 14 ।।
रक्ता श्यावा भवेत् पित्ताल्लिप्ताऽऽर्द्रा धवला कफात् ।
सैव दोषद्वयाधिक्ये दोषद्वितय लक्षणा ।। 15 ।।
परिदग्धा खरस्पर्शा कृष्णा दोषत्रयाधिकैः ।)
वायु के कोप से जीभ सागवान के पत्ते के समान खुरदरी
या सूखी एवं फटी हुई होती है। पित्त के कोप से लाल एवं
कुछ काली और कफ के कोप से चिपचिपाहट से युक्त, गीली
एवं सफेद होती है। दो-दो दोषों के कोप से दो-दो दोषों के
उपर्युक्त लक्षणों से युक्त और तीनों दोषों के कोप से चारों ओर
से जली हुई-सी, खुरदरी तथा काली होती है।
मूत्र-परीक्षा
(वातेन पाण्डुरं मूत्रं पीतं नीलं च पित्ततः ।। 16 ।।
रक्तमेवं भवेद् रक्ताद् बहलं फेनिलं कफाद् ।)