शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः
शोणितस्रावविधिः
रोगानुसार रक्त-निर्हरण
शोणितं स्रावयेज्जन्तोरामयं प्रसमीक्ष्य च।
प्रस्थं प्रस्थार्धकं वापि प्रस्थार्धार्धमथापि वा।।1।।
रोग का भली-भाँति विचार कर ही रोगी का रक्त
निकालना उचित होता है। रक्त एक प्रस्थ ( 13 ।। पल या 54
तोला), आधा प्रस्थ ( 27 तोला) अथवा चौथाई प्रस्थ ( 13 ।।
तोला) ही निकालना उचित है।
रक्त-निर्हरण काल तथा लाभ
शरत्काले स्वभावेन कुर्याद् रक्तस्रुतिं नरः।
त्वग्दोषग्रन्थिशोथाद्या न स्यू रक्तस्रुतेर्यतः।।2।।
स्वभावतः शरद् ऋतु (आश्विन-कार्तिक) में रक्तस्राव
करवाना चाहिये, क्योंकि इस समय रक्तस्राव से त्वचा के
रोग, ग्रंथियों के रोग तथा शोथ आदि रोग उत्पन्न नहीं होते।
वक्तव्य-सम्भवतः इसी सिद्धान्त के अनुसार ही रक्तसार
मनुष्य (सीमाप्रान्त के निवासी पठान जाति के लोग) प्रतिवर्ष
शरद् ऋतु (आश्विन तथा कार्तिक) में रक्त निकलवाते हैं।
शुद्ध तथा अशुद्ध रक्त का लक्षण
मधुरं वर्णतो रक्तमशीतोष्णं तथा गुरु।
शोणितं स्निग्धविस्रं स्याद् विदाहश्चास्य पित्तवत्।।3।।
विस्रता द्रवता रागश्चलनं विलयस्तथा।
भूम्यादिपञ्चभूतानामेते रक्तगुणाः स्मृताः।।4।।
शुद्ध रक्त का रस मधुर उसका वर्ण लाल तथा वह
समशीतोष्ण होता है (शरीर के भीतर उसका तापमान प्रायः
100 डिग्री होता है) और गुरु (जिस पात्र में जल 100 तोले
आ सकता है, उसमें रक्त 1055 तोला आ जाता है) होता है।
वह स्निग्ध (स्नेह युक्त) और विस्र (एक विशेष प्रकार की
आम गन्ध से युक्त) होता है। इसका विदाह पित्त के समान
(खट्टा) होता है। रक्त में भूमि आदि पञ्चमहाभूतों के गुण
पाये जाते हैं। यथा-1. विस्रता-एक प्रकार की गन्ध जो भूमि
का गुण है, 2. द्रवता अर्थात् पतलापन जो जल का गुण है, 3.
राग (रक्तता) जो अग्नि का गुण है, 4. चलन (गति) जो
वायु का गुण है और 5. विलय (विलीन हो जाना) जो
आकाश का गुण है।
वक्तव्य-रक्त पाँचभौतिक होता है, क्योंकि इसमें पाँचों
महाभूतों के तत्त्वों को सत्ता पायी जाती है। रक्त का रस कुछ
नमकीन भी होता है।
रक्तदुष्टि के लक्षण
रक्ते दुष्टे वेदना स्यात् पाको दाहश्च जायते।
रक्तमण्डलता कण्डूः शोथश्च पिटिकोद्गमः।।5।।
रक्त के दुष्ट (विकृत) हो जाने पर वेदना (पीड़ा), पाक
(उन-उन अवयवों का पक जाना), दाह, लाल-लाल चकत्ते
निकलना, कण्डू (खुजली), शोथ (सूजन) तथा फुन्सियों
का निकलना-ये लक्षण होते हैं।
रक्तवृद्धि के लक्षण
वृद्धे रक्ताङ्गनेत्रत्वं शिराणां पूरणं तथा।
गात्राणां गौरवं निद्रा मेदो दाहश्च जायते।।6।।
रक्त के बढ़ जाने पर शरीर पर तथा नेत्रों में रक्तता
(सुर्खी), शिराओं में पूर्णता, शरीर में भारीपन, नींद की
अधिकता, मद (नशा) तथा दाह-ये लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं।
रक्तक्षय के लक्षण
क्षीणेऽम्लमधुराकाङ्क्षा मूर्च्छा च त्वचि रूक्षता।
शैथिल्यं च शिराणां स्याद् वातादुन्मार्गगामिता ।।7।।
रक्त के घट जाने पर खट्टे तथा मीठे पदार्थों को खाने की
अभिलाषा, मूर्च्छा, त्वचा में रूखापन, शिराओं में शिथिलता
और वायु का उन्मार्गगामी अर्थात् कुपित हो जाना-ये लक्षण
उत्पन्न हो जाते हैं।
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