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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 356 में से

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पृष्ठ 216

180 शार्ङ्गधरसंहिता [ मध्यमखण्डे


[वाम स्तम्भ / Left Column]

स्वर्णमाक्षिक मारण-विधि
कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत् ।। 56 ।।
तक्रेण वाजमूत्रेण म्रियते स्वर्णमाक्षिकम्।
कुलथी के क्वाथ के साथ, एरण्ड के तैल के साथ, तक्र
(मट्ठा) के साथ अथवा बकरी के मूत्र के साथ पीसकर पुट
देने से स्वर्णमाक्षिक मर जाती है, अर्थात् उसकी उत्तम भस्म
बन जाती है।
वक्तव्य—ध्यान रहे—एरण्ड तैल की पुट देने से
स्वर्णमाक्षिक की काली एवं अन्य द्रवों की पुट देने से रक्त
वर्ण का भस्म तैयार होती है।
विमला शोधन विधि
कर्कटीमेषशृङ्गीत्यैर्द्रवैर्जम्बीरजैर्दिनम् ।। 57 ।।
भावयेदातपे तीव्रे विमला शुद्ध्यति ध्रुवम्।
बाँझककोड़ा (खेखसा), मेढासिंगी तथा जम्बीरी नींबू
के रस के साथ मिलाकर धूप में सुखा लेने से ही 'विमला'
अवश्य शुद्ध हो जाती है।
वक्तव्य—वर्ण-भेद से माक्षिक दो प्रकार की होती है—1.
स्वर्णमाक्षिक और 2. विमला। यह विमला भी दो प्रकार की
होती है—1. रजतमाक्षिक और 2. कांस्यमाक्षिक। इनमें पहली
स्वर्णाभ अर्थात् चमकदार पीली-सी और दूसरी श्वेताभ अर्थात्
काँसा के सदृश चमकदार सफेद होती है। विमला को
रौप्यमाक्षिक (रूपामाखी) एवं कांस्यमाक्षिक (कांसामाखी)
कहा जाता है। लोह, ताम्र एवं गन्धक का उचित परिमाण में
मिश्रण होकर पार्थिव अग्नि द्वारा पृथ्वी के भीतर ही उचित
परिपाक हो जाता है। अतएव विमलामाक्षिक को केवल भावना
देकर ही शुद्ध करने का विधान किया गया है। इसी प्रकार
स्वर्णमाक्षिक भी केवल नींबू के रस में अथवा गुलाबजल में
पीसकर प्रयुक्त की जा सकती है, किन्तु ऐसे अवसरों पर
शास्त्र की आज्ञा का पालन करना बहुत आवश्यक होता है।
तुत्थ-शोधन-विधि
विष्ठया मर्दयेत् तुत्थं मार्जारककपोतयोः ।। 58 ।।
दशांशं टङ्कणं दत्त्वा पचेन्मृदुपुटे ततः।
पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैर्देयं तुत्थविशुद्धये ।। 59 ।।
तूतिया (नीला थोथा) को समान भाग बिल्ली तथा
कबूतर के पुरीष (वीट) के साथ मिलाकर पीसना चाहिये
और तूतिया की अपेक्षा दशमांश टंकण डालकर तथा पीसकर
मृदुपुट (कुक्कुटपुट) में पुट दें। तत्पश्चात् दही से पीसकर


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

एक पुट तथा एक पुट मधु के साथ पीसकर देनी चाहिये। इस
तरह तूतिया शुद्ध हो जाता है।
वक्तव्य—तूतिया ताम्र-गन्धक का यौगिक है और यह
नीलवर्ण वाला पदार्थ होता है तथा शीघ्र कै कराने वाला है।
मोर के गले के सदृश वर्ण वाला होने के कारण यह 'शिखिग्रीव'
कहा जाता है। निम्नलिखित विधि से तूतिया में से ताम्र को
पृथक् किया जा सकता है। यथा—'तुत्थं टङ्कणसंयुक्तं
निम्बूद्रवविमर्दितम्। अन्धमूषागतध्मातं सत्त्वं मुञ्चति
ताम्रकम् ।। (आ० प्र० अ० 4.44)। अर्थात् तूतिया को टंकण
(सोहागा) एवं नींबू के रस के साथ पीसकर एवं अन्धमूषा में
रखकर तीव्र अग्नि देने से ताम्र का सत्त्व पृथक् हो जाता है।
अभ्रक-शोधन-विधि
कृष्णाभ्रकं धमेद् वह्नौ ततः क्षीरे विनिक्षिपेत्।
भिन्नपत्रं तु तत्कृत्वा तण्डुलीयाम्लयोर्द्रवैः ।। 60 ।।
भावयेदष्टयामं तदेवं शुद्ध्यति चाभ्रकम्।
कृष्णाभ्रक (काले अभ्रक) को अग्नि में भली-भाँति
तपाकर गाय के दूध में डाल दें और उसके पत्रों को अलग-
अलग करके चौलाई तथा तिपतिया (खटकल) के रस में
आठ प्रहर तक पड़ा रहने दें। इस प्रकार अभ्रक शुद्ध हो जाता
है।
अभ्रक मारण-विधि
कृत्वा धान्याभ्रकं तत्त शोषयित्वाथ मर्दयेत् ।। 61 ।।
अर्कक्षीरैर्दिनं खल्वे चक्राकारं च कारयेत्।
वेष्टयेदर्कपत्रैश्च सम्यग्गजपुटे पचेत् ।। 62 ।।
पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारं प्रयत्नतः।
ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद् देयं पुटत्रयम् ।। 63 ।।
म्रियते नात्र सन्देहः सर्वयोगेषु योजयेत्।
तुल्यं घृतं मृताभ्रेण लोहपात्रे विपाचयेत् ।। 64 ।।
घृते जीर्णे तदभ्रं तु सर्वयोगेषु योजयेत्।
मृतं त्वभ्रं हरेन्मृत्युं जरापलितनाशनम् ।। 65 ।।
अनुपानैश्च संयुक्तं तत्तद् रोगहरं परम्।
उक्त विधि से शुद्ध किये हुये अभ्रक को धान्याभ्रक
बनाकर सुखा लें और खरल में डालकर आक के दूध के
साथ एक दिन तक पीसकर टिकिया बना लें, तत्पश्चात् उन्हें
मदार (आक) के पत्तों में लपेटकर (ऊपर से कपड़मिट्टी
करके) गजपुट से पुट दें, फिर आक के दूध में पीसें और
पूर्वोक्त विधि से पुट दें। इसी प्रकार प्रयत्न करके सात पुटें