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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 215, कुल 356 में से

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पृष्ठ 215

एकादशोऽध्यायः] धातुशोधनमारणकल्पना 179
पर्यन्त मर्दन करे और टिकिया बनाकर उन्हें सुखाकर पुट दें।
इस प्रकार सात पुटें देने से लोह की भस्म बन जाती है।
अथवा कुठेरक, गिलोय, छिलहिण्टा, स्तन्य (स्त्री का दूध)
तथा आक के दूध के साथ पीसकर पुटें देने से लोह की भस्म
हो जाती है।
वक्तव्य-शिंगरफ के संयोग से जो लोह भस्म बनायी
जाती है, वह अत्यन्त रक्तवर्ण की होती है, किन्तु वारितर
(पानी के ऊपर तैरने वाली) नहीं होती। अतः अन्यान्य
औषधियों के रसों की 100 अथवा इससे भी अधिक पुटें देनी
चाहिये, जिससे वह वारितर हो जाये, क्योंकि लोहभस्म का
वारितर होना परमावश्यक है। लोहभस्म यकृत-विकार की
एवं पाण्डुरोग की परमौषध है। तीक्ष्णलोह वही होता है, जिसके
चाकू, उस्तरे एवं तलवार आदि तीक्ष्ण धार वाले शस्त्र बनाये
जाते हैं। भस्म बनाने के लिए यही लोहा सर्वोत्तम माना जाता
है। लोह का गुरुत्व 7.5 और द्रवणांक 1550° से० है।
तीसरी विधि
सूतकाद् द्विगुणं गन्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् ।।48।।
द्वयोः समं लोहचूर्णं मर्दयेत् कन्यकाद्रवैः।
यामयुग्मं ततः पिण्डं कृत्वा ताम्रस्य पात्रके ।।49।।
घर्मे धृत्वा रुबूकस्य पत्रैराच्छादयेद् बुधः।
यामार्धेनोष्णतां भूयाद्धान्यराशौ न्यसेत् ततः ।।50।।
दत्त्वोपरि शरावं तु त्रिदिनान्ते समुद्धरेत्।
पिष्ट्वा च गालयेद् वस्त्रादेवं वारितरं भवेत् ।।51।।
एवं सर्वाणि लोहानि स्वर्णादीन्यपि मारयेत्।
शिलागन्धाकदुग्धाक्ताः स्वर्णाद्याः सर्वधातवः ।।52।।
म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा।
पारद से दुगुनी गन्धक लेकर दोनों की कज्जली बनायें,
फिर दोनों (पारद तथा गन्धक) के समान भाग लोहचूर्ण
मिलाकर घीकुआर के रस के साथ दो प्रहर (6 घंटों) पर्यन्त
भली-भाँति मर्दन करें। तत्पश्चात् एक पिण्ड बनाकर और
ताम्र के पात्र में रखकर, एरण्ड के पत्तों से ढाँककर धूप में रख
दें। आधे पहर (1½ घण्टा) में जब उष्ण हो जाये तो ऊपर से
दूसरे शराव (सकोरे) से ढाँककर धान्यराशि (गेहूँ आदि के
ढेर) में दबा दें और तीन दिन के पश्चात् निकाल लें तथा
पीसकर कपड़े से छान लें। इस प्रकार लोह भस्म वारितर
तैयार हो जाती है। उक्त विधि से सुवर्ण आदि सभी लोहों
अर्थात् धातुओं की भस्म बनायी जा सकती है और मैनसिल,
गन्धक तथा आक के दूध में उपर्युक्त विधि से मिलायी हुई
स्वर्ण आदि सभी धातुएँ बारह पुटों में मर जाती हैं, अर्थात्
उनकी भस्म हो जाती है।
वक्तव्य-हमारा विचार है कि उपर्युक्त विधि में
पारदगन्धक की कज्जली में लोहचूर्ण नहीं अपितु दस-बीस
पुटें जिस लोह भस्म में दी जा चुकी हों, उस लोह भस्म को
डालें और इस प्रकार भस्म में कज्जली मिली रहती है, जो
किसी प्रकार पृथक् नहीं की जा सकती। इस प्रकार बनायी
गयी लोह भस्म उत्तम मानी जाती है।
उपधातु संख्या
माक्षिकं तुत्थकाभ्रे च नीलाञ्जनशिलालकाः ।।53।।
रसकश्चेति विज्ञेया एते सप्तोपधातवः।
माक्षिक, तुत्थक (तूतिया या नीला थोथा), अभ्रक,
नीलाञ्जन (काला सुरमा), शिला (मैनसिल), आलंक
(हरिताल) तथा रसक ये सात द्रव्य उपधातु कहे जाते हैं।
वक्तव्य-उक्त सात पदार्थ यौगिक हैं, अर्थात् ये कई
पदार्थों के मिश्रण से भूगर्भ में निर्मित होते हैं।
स्वर्णमाक्षिक शोधन-विधि
माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च ।।54।।
मातुलुङ्गद्रवैरथ जम्बीरोत्थद्रवैः पचेत्।
चालयेल्लोहजे पात्रे यावत् पात्रं सुलोहितम् ।।55।।
भवेत् ततस्तु संशुद्धं स्वर्णमाक्षिकमृच्छति।
माक्षिक (सोनामाखी) तीन भाग (3 सेर) तथा सेंधा
नमक एक भाग (1 सेर) दोनों को पीसकर बिजौरा नीबू,
जम्बीरी नीबू या कागजी नीबू के रस में मिलाकर तथा लोहे
की कड़ाही में डालकर तब तक पकायें और खुरचने से तब
तक चलाते रहें, जब तक पात्र का तलभाग रक्तवर्ण का न हो
जाय। इस प्रकार स्वर्णमाक्षिक (सोनामाखी) शुद्ध हो जाती है।
वक्तव्य-उक्त विधि से शुद्ध की हुई स्वर्णमाक्षिक का
सेवन किया जा सकता है। स्वर्णमाक्षिक लोह ताम्र (इसमें
ताम्र स्वल्पमात्रा में होता है) एवं गन्धक का यौगिक पदार्थ
है, अत एव शुद्ध करते समय इसमें से जो धुआँ निकलता है,
उसमें गन्धक की गन्ध होती है। यह गुजरात प्रान्त में बहने
वाली 'ताप्ती' नदी के आसपास प्राप्त होती है, अतएव इसका
नाम 'ताप्य' या 'तापीज' है। पीली चमकदार मक्खी के
समान वर्णयुक्त होने के कारण इसे 'स्वर्णमाक्षिक' कहा जाता
है। उक्त विधि से शोधित स्वर्णमाक्षिक का वर्ण अत्यन्त
रक्तवर्ण होता है।