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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 356 में से

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पृष्ठ 207

दशमोऽध्यायः ] आसवारिष्टकल्पना 171
[बायाँ स्तम्भ]
सेर), डालकर घोल दें। धाय के फूल सोलह पल (64
तोला), पीपल दो पल (8 तोला), जायफल, शीतलचीनी,
बड़ी इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता, नागकेसर, लौंग एवं मरिच
प्रत्येक एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर और उनका चूर्ण
बनाकर उपर्युक्त घोल में मिला दें। तत्पश्चात् इसे घृतलिप्त
मृत्तिकापात्र (घड़ा) में डालकर एक मास पर्यन्त पड़ा रहने दें
और तैयार हो जाने पर छानकर रख लें। इसका नाम
'बब्बूलारिष्ट' है। यह क्षयरोग, कुष्ठ, अतिसार, प्रमेह, श्वास
एवं कास को जीतता है।
द्राक्षारिष्ट
द्राक्षातुलाधं द्विद्रोणे जलस्य विपचेत् सुधीः।।71।।
पादशेषे कषाये च पूते शीते विनिक्षिपेत्।
गुडस्य द्वितुलां तत्र त्वगेलापत्रकेशरम्।।72।।
प्रियङ्गुर्मरिचं कृष्णा विडङ्गं चेति चूर्णयेत्।
पृथक्पलोन्मितैर्भागैस्ततो भाण्डे निधापयेत्।।73।।
समन्ततो घट्टयित्वा पिबेज्जातरसं ततः।
उरःक्षतं क्षयं हन्ति कासश्वासगलामयान्।।74।।
द्राक्षारिष्टाह्वयः प्रोक्तो बलकृन्मलशोधनः।
द्राक्षा (दाख) आधी तुला (2½ सेर) लेकर और पीसकर
दो द्रोण जल में डालकर क्वाथ करें और चतुर्थांश रहने पर
छान लें। जब यह क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें गुड़ दो
तुला (10 सेर) डालकर घोल दें और दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, नागकेसर, फूलप्रियंगु, मरिच, पीपल एवं
वायविडंग प्रत्येक द्रव्य 4-4 तोला लेकर और इनका चूर्ण
बनाकर उक्त घोल में मिला दें। तत्पश्चात् घृतलिप्त मृत्तिकापात्र
में डालकर पात्र के मुख को बन्द करके सुरक्षित स्थान में रख
दें। जब तैयार हो जाये तो उचित मात्रा में सेवन करें। यह
अरिष्ट उरःक्षत (वक्षःस्थल के भीतरी घाव), क्षयरोग (यक्ष्मा),
कास, श्वास एवं गले के रोगों को नष्ट करता है। इसका नाम
'द्राक्षारिष्ट' है। यहाँ बलकारक एवं मलशोधक है।
वक्तव्य-उक्त अरिष्ट में द्रव अर्थात् द्राक्षा क्वाथ बहुत
कम कहा गया है, क्योंकि लगभग 6¼ सेर द्रव में दस सेर
गुड़ बहुत अधिक हो जाता है। अतः चतुर्थांश शेष न करके
आधा शेष रहने पर अर्थात् 12-13 सेर जल शेष रहे तभी
उसमें गुड़ घोलकर मिला देना चाहिये।
रोहीतकारिष्ट
रोहीतकतुलामेकां चतुर्द्रोणे जले पचेत्।।75।।
[दायाँ स्तम्भ]
पादशेषे रसे शीते पूते पलशतद्वयम्।
दद्याद् गुडस्य धातक्याः पलषोडशिका मता।।76।।
पञ्चकोलं त्रिजातं च त्रिफलां च विनिक्षिपेत्।
चूर्णयित्वा पलाशेन ततो भाण्डे निधापयेत्।।77।।
मासादूर्ध्वं च पिबतां गुदजा यान्ति सङ्क्षयम्।
ग्रहणीपाण्डुहृद्रोगप्लीहगुल्मोदराणि च।।78।।
कुष्ठशोफारुचिहरो रोहितारिष्टसंज्ञकः।
रोहिड़ा की जड़ की छाल एक तुला (5 सेर) लेकर और
उसको जौकुट करके चार द्रोण जल में पकायें जब एक द्रोण
(12 सेर 3 पाव 4 तोला) शेष रह जाये तो छान लें। जब यह
क्वाथ शीतल हो जाये तो इसमें गुड़ दो तुला (10 सेर)
डालकर घोल दें और धाय के फूल सोलह पल (64 तोला),
पिप्पली, पीपलामूल, चव्य, चीता, सोंठ, दालचीनी, बड़ी
इलायची, तेजपत्ता, हरड़, बहेड़ा तथा आँवला प्रत्येक द्रव्य
एक-एक पल (4-4 तोला) लेकर और उनका चूर्ण बनाकर
उक्त घोल में मिला दें और उपर्युक्त सभी द्रव्यों के घोल को
घृत से स्निग्ध मृत्तिकापात्र में डालकर रख दें। एक मास के
पश्चात् निर्मल द्रव छान लें। इस अरिष्ट को पीने वाले रोगियों
के गुदांकुर (अर्श के मस्से) समाप्त हो जाते हैं और ग्रहणीरोग,
पाण्डुरोगों, हृद्रोग, प्लीहारोग, गुल्मरोग तथा उदररोग विनाश
को प्राप्त हो जाते हैं। यह अरिष्ट कुष्ठ, शोथ (सूजन) तथा
अरुचि को भी हरता है। इसका नाम 'रोहीतकारिष्ट' है।
दशमूलारिष्ट
(पष्ण्यौ बृहत्यौ गोकण्टो बिल्वोऽग्निमन्थकोऽरलुः ।।79।।
पाटला काश्मरी चेति दशमूलमिहोच्यते।)
दशमूलानि कुर्वीत भागैः पञ्चपलैः पृथक्।।80।।
पञ्चविंशत्पलं कुर्याच्चित्रकं पौष्करं तथा।
कुर्याद् विंशत्पलं लोध्रं गुडूची तत्समा भवेत्।।81।।
पलैः षोडशभिर्धात्री रविसङ्ख्यैर्दुरालभा।
खदिरो बीजसारश्च पथ्या चेति पृथक्पलैः।।82।।
अष्टभिर्गणितैः कुष्ठं मञ्जिष्ठा देवदारु च।
विडङ्गं मधुकं भार्ङ्गी कपित्थ्योऽक्षः पुनर्नवा।।83।।
चव्यं मांसी प्रियङ्गुश्च सारिवा कृष्णजीरकम्।
त्रिवृता रेणुकं रास्ना पिप्पली क्रमुकः शठी।।84।।
हरिद्रा शतपुष्पा च पद्मकं नागकेशरम्।
मुस्तमिन्द्रयवः शृङ्गी जीवकर्षभकौ तथा।।85।।
मेदा चान्या महामेदा काकोल्यौ ऋद्धिवृद्धिके।
कुर्यात् पृथग् द्विपलिकान् पचेदष्टगुणे जले।।86।।