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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 167, कुल 356 में से

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पृष्ठ 167

सप्तमोऽध्यायः ] वटककल्पना 131


चीता का जड़ एवं तेजबल (तिमूर) की छाल-ये सब द्रव्य
दो-दो तोला, सूरण (सूखा जिमीकन्द) 32 तोला, विधारा
16 तोला एवं शुद्ध भिलावा 16 तोला। इन सब द्रव्यों को
जौकुट करके एक द्रोण (19 सेर 3 पाव 4 तोला) जल में
डालकर पकायें, चौथाई भाग शेष रहने पर छानकर क्वाथ ले
लें। फिर इस क्वाथ में क्वाथ्य द्रव्यों (इन्द्रायण से
भिलावा-पर्यन्त) से तिगुना (3 सेर 3 छटाँक 3 तोला) गुड़
डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकायें। जब यह जान लें कि
गुड़ का पाक भली प्रकार हो गया है तो उसमें चीता का जड़,
निसोत, दन्ती एवं तेजबल प्रत्येक का (12-12 तोला)
कपड़छन चूर्ण मिला दें और तत्काल नीचे उतार लें, तत्पश्चात्
शीतल हो जाने पर 64 तोला उत्तम मधु डालकर मिला दें।
इस प्रकार तैयार किया हुआ यह योग 'श्रीमान् बाहुशाल गुड़'
कहलाता है। यह गुड़ सभी प्रकार की बवासीर, गुल्म,
वातजनित उदररोग, आमवात या आढ्यवात, प्रतिश्याय,
संग्रहणी, क्षय, पीनस, हलीमक, पाण्डुरोग तथा प्रमेह को
जीतता है।
वक्तव्य-सूरण को छोटे-छोटे टुकड़े करके सुखा लिया
जाता है। इसका अनुपान रोगों के अनुकूल चुन लेना चाहिये।
यह गुड़ बवासीर का उत्तम औषध है।

मरिचादि गुटिका
मरिचं कर्षमात्रं स्यात् पिप्पली कर्षसम्मिता ।। 13 ।।
अर्धकर्षो यवक्षारः कर्षयुग्मं च दाडिमम्।
एतच्चूर्णीकृतं युञ्ज्यादष्टकर्षगुडेन हि ।। 14 ।।
शाणप्रमाणां गुटिकां कृत्वा वक्त्रे विधारयेत्।
अस्याः प्रभावात् सर्वेऽपि कासा यान्त्येव सङ्क्षयम् ।। 15 ।।
मरिच का चूर्ण 1 तोला, पीपल का चूर्ण 1 तोला, जौखार
आधा तोला तथा अनार के छिलकों का चूर्ण दो तोला लेकर
आठ तोला गुड़ की चासनी बनाकर, उसमें चूर्ण को मिलाकर
एक शाण (1.4 तोला) भर की गोलियाँ बनाकर सुखा लें।
इनमें से एक गोली को मुख में रखकर चूसते रहें। इसके
प्रभाव से सब प्रकार के कास विनाश को प्राप्त हो जाते हैं। ये
गोलियाँ 'मरिचादि गुटिका' नाम से प्रसिद्ध हैं।
वक्तव्य-गुड़ की चासनी कुछ कड़ी बना लेनी चाहिये,
जिससे गोलियाँ भली-भाँति चूसी जा सकें। इसमें अनार का
छिलका कुछ भूनकर डालना चाहिये। यह अकेला भी खाँसी
में बहुत लाभ करता है।


गुडादि गुटिका
गुडशुण्ठीशिवामुस्तैर्गुटिका धारयेन्मुखे।
श्वासकासेषु सर्वेषु बिभीतं वापि केवलम् ।। 16 ।।
गुड़, सोंठ, बड़ी हरड़ तथा नागरमोथा की गोलियाँ बनाकर
श्वासरोग तथा कास रोगों में मुख में रखकर चूसना चाहिये
अथवा केवल बहेड़ा का छिलका उक्त रोगों (श्वास-कास)
में चूसना चाहिये।
वक्तव्य—इस योग में शुण्ठी आदि के चूर्ण की अपेक्षा
गुड़ दुगुना लेकर कड़ी चासनी बना लेनी चाहिये-'वटीषु
द्विगुणो गुडः' ताकि गोलियाँ कड़ी तैयार हो सकें। चूर्ण को
चासनी में मिलाकर तत्काल गोलियाँ बना लेनी चाहिये, अन्यथा
चासनी ठंडी हो जायेगी फिर गोलियाँ नहीं बन सकेंगी।

आमलक्यादि गुटिका
आमलं कमलं कुष्ठं लाजाश्च वटरोहकः।
एतच्चूर्णस्य मधुना गुटिकां धारयेन्मुखे ।। 17 ।।
तृष्णां प्रवृद्धां हन्त्येषा मुखशोषं च दारुणम्।
आँवला, कमल, मीठाकूठ, धान का लावा (खील)
और वट-प्ररोह (बरगद की जटा या वरोह) इन सबका चूर्ण
बनाकर समान भाग मधु के साथ गोलियाँ बनाकर मुख में
रखकर चूसते रहें। यह गोली बढ़ी हुई प्यास को तथा भीषण
मुखशोष को नष्ट करती है।
वक्तव्य-मधु की चासनी बनाकर गोलियाँ बनायी जाती
हैं और बनाना चाहिये, अन्यथा मुख में रखी नहीं जा सकतीं।
यद्यपि भारतीय वैद्य समाज 'हन्त्यान्मधूष्णम्' (चरकसंहिता
सू० अ० 27) तथा 'उष्णैर्विरुध्यते सर्वं विषान्वयतया मधु।
उष्णार्तमुष्णैरुष्णे वा तन्निहन्ति यथा विषम्' ।। (सु० सू०
अ० 45.144)-दोनों संहिताओं का तात्पर्य यह है कि गरम
किया हुआ मधु मार डालता है और उष्ण पदार्थों के साथ मधु
का योग विरुद्ध होता है, क्योंकि उसमें विष का सम्बन्ध होता
है या विषैली मक्खियाँ उसका संचय करती हैं और गर्मी से
पीड़ित मनुष्य को उष्ण पदार्थों के साथ उष्णकाल में विष के
समान यह मार डालता है-इत्यादि वचनों के आधार पर मधु
को गरम करना उचित नहीं समझते, किन्तु यूनानी पद्धति के
चिकित्सक मधु की चासनी में सैकड़ों योग बनाते हैं और
प्रतिदिन उनका प्रयोग करते हैं। अतः हमारा विचार है कि
चरक तथा सुश्रुत के उपर्युक्त वाक्य केवल 'पौत्तिक' मधु से
सम्बन्ध रखते हैं, क्योंकि 'विशेषात्पौत्तिकं तेषु रूक्षोष्णं