शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 166, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः
वटककल्पना
बटी के पर्याय नाम
वटकाश्चाथ कथ्यन्ते तन्नाम गुटिका वटी।
मोदको वटिका पिण्डी गुडो वर्तिस्तथोच्यते।।1।।
चूर्णों का वर्णन करने के पश्चात् अब यहाँ से वटक कहे
जा रहे हैं। उनको गुटिका, बटी, वटिका, मोदक, पिण्डी, गुड़
एवं वर्ति भी कहा जाता है।
वक्तव्य- औषधियों की गोलियाँ बनाकर सेवन करने
तथा कराने में रोगी तथा चिकित्सक दोनों को सुविधा रहती
है। उक्त सब गोलियों के ही नामान्तर हैं।
बटी-निर्माण की विधि
लेहवत् साध्यते वह्नौ गुडो वा शर्करार्थवा।
गुग्गुलुर्वा क्षिपेत् तत्र चूर्णं तन्निर्मिता वटी।।2।।
गुड़ अथवा चीनी अथवा गूगल को अग्नि पर चढ़ाकर
लेह (अवलेह या लेई) के समान तैयार किया जाता है और
उनमें चूर्ण डालकर गोलियाँ बना ली जाती हैं।
बटी-निर्माण की दूसरी विधि
कुर्याद्वह्निसिद्धेन क्वचिद् गुग्गुलुना वटीम्।
द्रवेण मधुना वापि गुटिकां कारयेद् बुधः।।3।।
कभी-कभी गूगल को अग्नि द्वारा पकाये बिना ही, उससे
गोलियाँ बना ली जाती हैं। विद्वान् चिकित्सक किसी द्रव
(तरल पदार्थ) के संयोग से अथवा मधु के संयोग से भी
गोलियाँ बना सकते हैं।
बटी में सिता आदि का मान
सिता चतुर्गुणा देया वटीषु द्विगुणो गुडः।
चूर्णाच्चूर्णसमः कार्यों गुग्गुलुर्मधु तत्समम्।।4।।
द्रवं च द्विगुणं देयं मोदकेषु भिषग्वरैः।
कर्षप्रमाणा तन्मात्रा बलं दृष्ट्वा प्रयुज्यते।।5।।
गोलियों में चूर्ण द्रव्यों की अपेक्षा चीनी चौगुनी ली
जाती है और गुड़ दुगुना तथा गूगल एवं मधु समान भाग
लिया जाता है। बुद्धिमान् चिकित्सक गोलियों में द्रव पदार्थ
दुगुना डालते हैं। गोलियों की मात्रा साधारणतया एक कर्ष
(1 तोला) मानी जाती है। किन्तु रोग, रोगी एवं औषधियों के
बल को देखकर मात्रा की व्यवस्था कर लेनी चाहिये।
वक्तव्य- मात्रा का उक्त निर्देश (1 तोला) सामान्य रूप
से किया गया है, क्योंकि इस अध्याय में ऐसे भी योग हैं,
जिनकी मात्रा एक रत्ती की है, यथा-सञ्जीवनी बटी। इसीलिए
'बलं दृष्ट्वा प्रयुज्यते' कहा गया है।
बाहुशाल गुड़
इन्द्रवारुणिका मुस्तं शुण्ठी दन्ती हरीतकी।
त्रिवृच्छठी विडङ्गानि गोक्षुरश्चित्रकस्तथा।।6।।
तेजोह्वा च द्विकर्षाणि पृथग् द्रव्याणि कारयेत्।
सूरणस्य पलान्यष्टौ वृद्धदारु चतुष्पलम्।।7।।
चतुष्पलं स्याद् भल्लातः क्वाथयेत् सर्वमेकतः।
जलद्रोणे चतुर्थांशं गृह्णीयात् क्वाथमुत्तमम्।।8।।
क्वाथ्यद्रव्यात् त्रिगुणीतं गुडं क्षिप्त्वा पुनः पचेत्।
सम्यक् पक्वं च विज्ञाय चूर्णमेतत् प्रदापयेत्।।9।।
चित्रकत्रिवृतादन्तीतेजोह्वाः पलिकाः पृथक्।
पृथक्त्रिपलिकाः कार्या व्योषैलामलक्त्वचः।।10।।
निक्षिपेन्मधु शीते च तस्मिन् प्रस्थप्रमाणतः।
एवं सिद्धो भवेच्छ्रीमान् बाहुशालगुडः शुभः।।11।।
जयेदशांसि सर्वाणि गुल्मं वातोदरं तथा।
आमवातप्रतिश्यायग्रहणीक्षयपीनसान् ।।12।।
हलीमकं पाण्डुरोगं प्रमेहं च विनाशयेत्।
इन्द्रायण की जड़, नागरमोथा, सोंठ, दन्ती (जमालघोटा)
की जड़, बड़ी हरड़, निसोत सफेद, कचूर, वायविडंग, गोखरू,