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सर्वकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 511 में से

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पृष्ठ 78

चतुर्थ पटल

अथ दीक्षां प्रवक्ष्यामि मन्त्राणां हितकाम्यया ।
विना यया न लभ्येत सर्वमन्त्रफलं यतः ।१
दिव्यं ज्ञानं यतो दद्यात्कुर्यात्पापस्य संक्षयः ।
तस्माद्दीक्षेति संप्रोक्तं सर्वमान्त्रवेदिभिः ।२
चतुर्विधा सा सन्दिष्टा क्रियावत्यादि भेदतः
क्रियावती वर्णमयी कलात्मा वेधमय्यपि ।३
ताः क्रमेणैव कथ्यन्ते तन्त्रेऽस्मिन्संपदावहाः ।
देशिको विधिवत्स्नात्वा कृत्वा पौर्वाह्निकीः क्रियाः ।४
प्रायादलङ्कृतो मौनी यागार्थं यागमण्डपम् ।
आचम्य विधिना तत्र सामान्यार्घ्यं विधाय च ।५
द्वारमस्त्राम्बुभिः प्रोक्ष्य द्वारपूजां समाचरेत् ।
ऊर्ध्वोदुम्बरके तत्र महालक्ष्मीं सरस्वतीम् ।६
ततो दक्षिणशाखायां विघ्नं क्षेत्रेशमन्यतः ।
तयोः पार्श्वगते गङ्गायमुने पुष्पवारिभिः ।७
देहाल्यामर्चयेदस्त्रं प्रतिद्वारा ति क्रमात् ।
अनन्तरं देशिकेन्द्रो दिव्यदृष्ट्यवलोकनात् ।८
इसके अनन्तर मन्त्रों के हित सम्पादन की कामना से दीक्षा के
विषय में बतलाऊँगा, क्योंकि बिना दीक्षा के सभी मन्त्रों का फल
नहीं प्राप्त किया जाया करता है ।१। जिसके द्वारा परम दिव्य ज्ञान
प्रात हो और समस्त पापों का संक्षय हो उसी का तन्त्र शास्त्र के ज्ञाता
आचार्यवरों के द्वारा इसको दीक्षा कहा गया है ।२। वह दीक्षा क्रिया-
वती आदि के भेदों से चार प्रकार की सन्दिष्ट की गई है । उन भेदों के
नाम ये हैं - क्रियावती--वर्णमयी--कलात्मा और वेधमयी--ये ही
चार हैं । अब उन चारों को ही क्रम से यहाँ कहा जाता है जो इस