शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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विद्दिग्गतचतुष्कानि भित्त्वा षोडशधा सुधीः ।
मार्जयेत्स्वस्तकाकारं (२) श्वेतपीतासितारुणैः । १३७
रजोभिः पूरयेत्तानि स्वस्तिकानि शिवादितः ।
प्राक् प्रोक्तेनैव मार्गेण शेषमन्यत्समापयेत् ।१३८
नवनाभमिदं प्रोक्तं मण्डलं सर्वसिद्धिदम्
पञ्चाब्जं मण्डलं प्रोक्तमेतत्स्वस्तिकवर्जितम् ।१३६
दीक्षायां देवपूजार्थं मण्डलानां चतुष्टयम् ।
सर्वतन्त्रानुसारेण प्रोक्तं सर्वसमृद्धिदम् ।१४०
सुधी पुरुष चतुशस्र में चौंसठ पदों की रचना करे । चार पदों से
पद्म होता है फिर उसके चारों ओर मध्य में चार वीणियों बनावे जो
मण्डल के अन्तवास वाली होवे । दिशामें संस्थित चारों कोंनों में पंक्तियों
को लिखे ।१३५-१३६। विदिशाओं में स्थित चारों को सुधी सोलह
भागों में भेदन करके स्वस्तिक के आकार वालेका मार्जन करे । शिवादि
ले श्वेत पीत-असित-अरुण रज से उन स्वस्तिकों को पूरित कर देवे ।
पूर्व में बताते हुये ही मार्ग के द्वारा अन्य शेष का अन्य शेष का समापन
करना चाहिये ।१३७-१३८। यह मण्डल नवभाव कहा गयाहै जो समस्त
सिद्धियों का प्रदान करने वाला होता है यह पाँच कमलों वाला मण्डल
कहा गया है जो स्वस्तिक से रहित होता है ।१३६। दीक्षा में-देवों की
पूजा के लिये मण्डलों का चतुष्टय होता है । सभी तन्त्रों के अनुसार यह
सब समृद्धियों का प्रदाता बताया गया है ।१८०।