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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 494, कुल 511 में से

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पृष्ठ 494

४६४ ] [ श्रीशारदा तिलक
पाश्चात्त्योत्तरयाम्यप्रागूर्ध्ववक्त्रेषु साधकः ।
पदानि दश विन्यस्येदेषु स्थानेषु मन्त्रवित् ॥१२
शिरोभ्रू मध्यदृग्वक्त्रे कण्ठहृन्नाभि गुह्यके ।
जाननोः पादयोर्युग्मे तच्छिरः शिरसि न्यसेत् ॥१३
हृदयं ब्रह्मणे प्रोक्तं विष्णवे शिर ईरितम् ।
शिखा रुद्राय कवचमीश्वराय समीरिनम् ॥१४
गायत्री के मुनि विश्वामित्र, जो महतीद्युति वाले थे, बताये गये
हैं। इसका गायत्री छन्द है और इसका देवता सविता कहा गया है ।८।
इसके शिर का मुनि ब्रह्मा है-देव्यादिका छन्द कहा गया है । बुधों के
द्वारा इसका परमात्मा गायत्री देवता कहा गया है ।६। भू आद्य सात
व्याहृतियों का हृदय, मुख, अंस और अरु दोनों जठर में न्यास करके
मन्त्र ज्ञाता को गायत्री के वर्णों का स्तनों में न्यास करना चाहिए
।१०। पदों की सन्धियों से, ध्वज में नाभी में, हृदय में, कण्ठ में और
भुजाओं की सन्धियो में-मुख, नासिका, कपोल, नेत्र, भ्रू, मस्तक में
में साधक पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, पूर्व और ऊर्ध्व वस्त्र में दश पदों
का विन्यास करके मन्त्र के वेत्ताओं को इन स्थानों में न्यास करना
चाहिये ।११।१२। शिर, भ्रूओं कामध्य भाग, लोचन, मुखमें तथा कण्ठ
हृदय, नाभि और गुह्य भाग में, जानुओंमें, एवं दोनोंमें पादों में उसके
शिर का न्यास करना चाहिए ।१३। हृदय ब्रह्माजी के लिए कहा गया है
और भगवान् विष्णु के लिए शिर बताया गया है। शिखा रुद्रदेव के
लिए और कवच ईश्वर के लिए समुदीरित किया गया है ।१४।
नेत्रं सदाशिवायोक्तमस्त्रं सर्वात्मने स्मृतम् ।
षडङ्गान्‍तेवमुक्तानि यथा स्थानं प्र॒विन्यसेत् ॥१५