शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकविंश पटल ] [ ४६३
गायत्र्युष्णिगथानुष्टुब्वृहतीपक्तयः पुनः ।
त्रिष्टुब् जगत्थश्छन्दांसि कथितानि मनीषिभिः । ६
सप्तार्चिरनिलः सूर्यो वात्रयतिर्वरुणोवृषः ।
विश्वेदेवाः क्रमादासां देवताः परिकीर्त्तिताः । ७
इसमें सब आहुतियाँ का ओर गायत्री का अर्थ बताया गया है।
प्रणव जिनके आदि में होता है ऐसी उस गायत्री मन्त्र के आदि में
रहने वाली सात व्याहृतियाँ होती है । वे भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः,
तपः, सत्यम् ये सात व्याहृतियां हैं । इनके पूर्व में प्रणव होता है ।
शिर से समन्वित गायत्री चौवीस अक्षरों वाली होती है । यह गायत्री
मन्त्र समस्त वेदों का उद्धृत किया हुआ सार है— ऐसा ही उदाहृत
किया गया है । ब्रह्मा देवी आदि गायत्री और परमात्मा कहे गये हैं ।
प्रणव के ऋषि आदि मुनियों के द्वारा कीर्त्तित किये गये हैं । ३-४ ।
व्याहृतियोंके ऋषि जमदग्नि, भरद्वाज, भृगु, गौतम, कश्यप, विश्वामित्र
और वसिष्ठ होते हैं । ऐसा ही जान लेना चाहिये । ५। गायत्री, उष्णिक्,
अनुष्टुप्, वृहती, पङ्क्ति, त्रिष्टुप् और जगती ये छन्द हैं जो मनीषियों
के द्वारा बनाये गये हैं । ६। सप्तार्चि, अनिल, सूर्य, वाक्यापति, वरुण,
वृष और विश्वादेवा ये क्रम से इनके देवता कहे गये हैं । ७।
गायत्र्या मुनिराख्यातो विश्वामित्रो महाद्युतिः ।
गायत्रीच्छन्द इत्युक्तं देवता सविता स्मृता । ८
शिरसोऽस्य मुनिर्ब्रह्मा छन्दो देव्यादिका स्मृता ।
गायत्री परमात्मास्य देवता कथिता बुधैः । ६
व्याहृतीः सप्तभूराद्या हृन्मुखाक्षोरुयुग्मके ।
जठरे न्यस्य मन्त्रज्ञो गायत्र्यर्णांस्तनौ न्यसेत् । १०
पत्ससन्धिषु ध्वजे नाभौ हृत्कण्ठभुजसन्धिषु ।
आस्यनासाकपोलाक्षिकर्णभ्रू मस्तकं पुनः । ११