शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 459, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश पटल ] [ ४५६
काद्यार्णान् केमरेषु द्विगुणवसुदलेष्वर्पयेन्मध्यबीजम् ।
यन्त्रं संजीवनारूयं सोललपुणत क्षुद्ररोगापहारि ।५०
मध्ये पिण्डमघोदलाद्विषु लिखेद्धारीशताराधिप
प्रताधीशवरशक्रदिक्षु विमतेर्मध्ये चवर्णां लिखेत् ।
यादोन्मारुतवह्निरराक्षसशिवेष्वर्णान् बहिर्वेष्टयेत् ।
काद्यै वर्मविलोचनन कलितं पिण्डाख्ययन्त्रं परम् ।५१
अब गारुड़ यन्त्र बताया जाता है कौशेयवस्त्रमें क्लप्त और दो ईंटों
के मध्य में रहने वाला यन्त्र को सेनाग्र में गाड़ देवे तो निश्चय ही
स्तम्भन किया करता है। कर्णिकाके मध्य में श्री से युक्त नरसिंह बीज
लिखे। यहाँ श्री शब्द से एक देश रेफ का ग्रहण किया गया है। उसके
बाह्य में केसर स्वरों को लिखे तथा मध्य में गारुड़ मन्त्र को लिखना
चाहिए। इनको वारीट चन्द्र यम और इन्द्र दिशाओं में लिखे । बिन्दु
सहित अन्तस्थ वर्णों को मरुद्अग्नि निऋं ति और शिव दिशाओं में
लिखकर वर्णों वृत्त करे । विसर्ग युक्त आठ संवर्तकों से परिवृत गारुढ़
यन्त्र होता है ।४७। अब गारुड़ मन्त्र बतलाते हैं--नेत्रयुक्त सम्वर्तक
अर्थात् इकारसे संयुत क्षकार और पार्श्व अर्थात् पकार, प्रणव तथा अग्नि
सुन्दरी-स्वाहा-इस प्रकार का गारुड़ मन्त्र कहा गया है, जो कि स्थावर
और जङ्गम दोनों विषों का विनाश करने वाला होता है। इस गारुड़
मन्त्र का स्मरण करता हुआ जो मनुष्य जाप किया करता है वह वलो-
कन मात्रसे ही नागकुलसे समुत्पन्न विष का हनन कर देता है ।४८-४६।
अब सञ्जीवन मन्त्र बताया जाता है-आठ दलों वाली कर्णिका में
सकार में स्थित वकार से युक्त बीज को लिखे तथा विधि के सहित
साध्य का नाम लिखना चाहिए। किञ्जल्कों में स्वर होने चाहिए ।
द्विगुण वसु दलों में मध्य बीज को लिखे तथा केसरों में कादि शान्त
वर्णों का लेखन करे । द्विगुण वसुदल का अभिप्राय षोड़श दलों से होता
है यह प्रथम पटल में कथित सञ्जीवन नामक यन्त्र है जो क्षुद्र रोगों
का अपहरण करने वाला है, इसका मृत्यु जप देवता है ।५०। अब पिण्ड