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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 511 में से

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पृष्ठ 458

४५८ ] [ श्रीशारदा तिलक
ल्कार को त्याग करके उसके मध्य में वायु बीज को लिखे तथा
उसे वि-रक्त-मषी तथा कौए के मल से ध्वज वस्त्र पर लिखना
चाहिए। फिर उसे श्मशानसे निहित कर देवे तो अपने शत्रुओं का कुलो
च्छेद कर दिया करता है। वायुमय बीज का त्याग करके वहां पर
फट्कार लिखे । शव के वस्त्र पर कौए के रुधिरसे विधि के सहित लिखे
और उसको अभीष्ट स्थान में निखनन कर देवे तो मनुष्योंमें विद्वेष कर
दिया करता है। इसका तात्पर्य यह है कि जिनमें विद्वेषण करना होवे
दोनों उस स्थान का उल्लघन करे ऐसे ही स्थान में गाड़ना चाहिए ।
। ३६-४१। इसमें स्त्र बीज का त्याग कर सार्ण से युक्त लकार को
विशेष रूप से लिखे । यह मन्त्र लोहत्रय समावृत होना चाहिए। यह
समस्त रोगों का शमन करने वाला और कृत्या द्रोह आदि की शान्ति
करने वाला है। लृकार बीज का त्याग करके वहाँ पर ग्लौंकार लेखन
करे ।४२।४३। बाह्य में क्षकार से आवृत और फिर पाशांकु से वृत
होवें । फिर ठ पर से वृत हो और भूमि मण्डल के मध्य में जाने वाला
हो। उसके बाहिर क्रम से बिन्दु से युक्त लकारोंसे वेष्टित होवे । सर्गान्त
मातृ का बीज सब वृत से वेष्ठित होवे ।४४-४६।
मध्ये श्रीनरसिंहबीजमथ तद्बाह्ये स्वरान् केसरे ।
वारीट् चन्द्रयमेन्द्रदिक्षु विखिलेन्मध्ये मनुङ्गारुडम् ।
अन्तस्थाम् मरुदग्निनिऋ तिशैवेष्वालिख्य वर्णावृतम्।
यन्त्र मर्गिभिरष्टाभिः परिवृतं संवर्तकैङ्गारुडम् ।४७।
सवर्तकोनेत्रयुतः पार्श्वस्तारोग्निसुन्दरी ।
गारुडो मनुराख्यातो विषद्वयविनाशनः ।४८
स्मरन् गरुडमात्मानं मन्त्रमेनं जपेन्नरः ।
विषमालोकनेनैव हन्यान्नागकुलोद्भवम् । ६
मध्ये वार्ण भृगुस्थ विलिखतु विधिवत्साध्यनाम्ना समेतम्
किञ्जल्केषु स्वराः स्युर्व्वसुदलविवरेष्वालिखेन्मध्यबीजम् ।