शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें३५४ ] [ श्रीशारदा तिलक
ईशदिशा में विष्वक्सेन का अर्चन करे और इसके अनन्तर लोक-
पालों का अर्चन करे और इस रीति से देव का यजन करे तथा आत्मा
के अभीष्ट का साधन करे ।७५। बुध को चाहिए कि घृत के सहित दूर्वा
चरु से दश हजार आहुतियाँ देवे । पश्चात् सम्पतित चरु को जो
साधित है साध्य खा लेवे ।७६। होम के दिन में मधुर पदार्थोंसे ब्राह्मणों
को भली भाँति भोजन करावे । वस्त्रों से, धान्यों से, भूषणों से और
अर्थ के द्वारा अपने गुरुदेव को सन्तुष्ट करे ।७७। वह मानव फिर अप-
मृत्यु को जीत कर और रोगों पर विजय पाकर दीर्घ आयु का लाभ
किया करता है आज्य से सिक्त कमलों के द्वारा तीन अयुत अर्थात्
तीस हजार आहुतियां देनी चाहिए ।७८। उस पुरुष के गृह में कमला
निवास किया करती है और उसके पुत्रों का भी कभी त्याग नहीं करती
है । विल्व वृक्ष की समिधाओं के होम से मानव साक्षात् धनपति ही हो
जाया करता है ।७९। पूग के पुष्पों समायुक्त तण्डुलों से जो मधुर में
उक्षित होवें हवन करे तो शीघ्र ही वह सम्पदाओं का निधि हो जाया
करता है ।८०।
आज्येन जुहुयाल्लक्षं परान् जयति पार्थिवः ।
अब्जसूत्रं भुजेबद्धं मनुनानेन साधितम् ।८१
रोगापमृत्युदुःखानि नाशयेन्नात्र संशयः ।
जलाञ्जलिभिरात्मानमभिषिञ्चेद्दिनेदिने ।८२
स्नानकालेषु स भवेत् सौभाग्यश्रीसमृद्धिमान् ।
ऊर्ध्वबाहुर्द्वयो मन्त्री पश्यन्नादित्यमण्डले ।८३
सहस्रमानं प्रजपेन्नित्य निशिमधोर्मनुम् ।
सर्वे मनोरथास्तस्य सिद्ध्येयुर्नात्र संशयः ।८४
कृष्णाय पदमाभाष्य गोविन्दाय ततः परम् ।
गोपीजनपदस्यान्ते वल्लभाय द्वितावधिः ।८५
कामबीजादिराख्यातो मनुरष्टादशाक्षरः ।
नारदोऽस्य मुनिः प्रोक्तो गायत्रं छन्द उच्यते ।८६