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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पंचदश पटल } { ३५३
हैं तथा कमल के सदृश नेत्र हैं। जो शंख, चक्र, गदा और पद्म को
धारण करने वाले हैं- जिनका दर्शन परम मनोहर है-जिनका वक्षःस्थल
कौस्तुभ मणि से अंकित है-जो मुकुट, अङ्गद आदि भूषणों से विभूषि
है जिनका गरुड़ वाहन है-जो अच्युत और जगतों के स्वामी हैं, मैं
उनकी अपने हृदय में भावना करता हूँ ।६८-७०। मन्त्रधारी इस
मन्त्र का आठ लाख जप करे और जप का दशांश भाग विल्व-क्षीर
द्रुम की समिधाओं से-अरुण कमलों से-पयोऽन्नों से और घृत से हवन
कर के अपने गुरुदेव को धनों से सन्तुष्ट करना चाहिए । मूल से कल्पित
मूर्ति में देव का प्रतिदिन पूजन करना चाहिए ।७१-७२। आदिमें अङ्गों
का समाराधन करके दिक्पत्रों में अर्चन करे। श्री, धृति, कान्ति
का जो लीला पंकजों के धारण करने वाली है तथा पीत, अरुण, श्याम
और नील है इनका विदिशाओं के पत्रों में अर्चन करना चाहिए । वासु-
देव आदि मूर्तियों का पूजन करे। दोनों पाश्र्वों में दोनों विधियों का
यजन करे ।७३-७४।
विष्ण्ववसेनं यजेदीशे लोकपालानन्तरम् ।
एव सम्पूजयेद्देव ह्याधयेदिमात्मानः ।७५
दूर्वाचरुभ्या साज्यभ्यां जुहुयादयुतं बुधः ।
सपातितं चरु पश्चात्पाध्यो भुञ्जीत साधितम् ।७६
ब्राह्मणान् भोजयेत्सम्यङ् मधुरैर्वोमवासरे ।
तोषयेद्गुरुमर्थेन वस्त्रैर्धान्यैर्विभूषणैः ।७७
जित्वापमृत्युरोगादीन् दीर्घमायुः स विन्दति ।
आज्यसिक्तैः सरसिजैर्जुहुयादयुतत्रयम् ।७८
निवसेत्कमला तस्मिन्न त्यजेत्तत्सुवानपि ।
विल्ववृक्षसमिद्धोमात्साक्षाद्धनपतिर्भवेत् ।७६
पूगपुष्पसमायुक्तै स्तण्डुलैर्मधुरोक्षितैः ।
जुहुयादचिरादेव सम्पदं जायते निधिः ।८०