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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 511 में से

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पृष्ठ 172

१७२ ] [ श्री शारदा तिलक
अभीष्ट मनोरथों के लिए कल्प लतिकाके सदृश हैं और कमल के आसन
पर विराजमान हैं मैं वन्दना करता हूँ ।३१। हविष्य का भोजन करने
वाला पुरुष बारह लाख जप के अन्त में अरुण तथा विकसित कमलों के
द्वारा इन्द्रियों को अपने वश में रखते हुए बारह सहस्र आहुतियों का
हवन करे ।३२। रमादेवी के कल्पना किये हुए पीठ पर उसके विधान
से अभ्यर्चन करे । साधक वहाँ पर स्थित प्रयोगों को उस मन्त्र के द्वारा
करे ।३३। वह उपासक उपासना की हुई मूर्तिमान निधियों के द्वारा
नित्य ही सेवित हुआ करता है । नकार शक्ति-जिसके अन्त में विसर्ग
हों ऐसा ककार और मकार-वकार के अन्त में स्वरूप और स्वाहा-यह
दश अक्षरों वाला मन्त्र है । इसका ऋषि दक्ष है तथा विराट् छन्द है
और देवता इसका श्रीदेवी कही गयी है ।३४।५। देवी के लिए हृदय
कहा गया है और पद्मिनी के लिए शिर बताया गया है । विष्णुपत्नी
के लिए शिखा कही गयी है तथा वरदान के लिए तनुच्छद बताया
गया है ।३६।
अस्त्रं कमलरूपायै नमोऽन्ताः प्रणवादिकाः ।
अंगमन्त्राः समुद्दिष्टा ध्यायेद्देवीमनुन्यधीः ।३७
जासीना सरसीरुहे स्मितमुखी हस्ताम्बुजैर्विभ्रती ।
दानं पद्मयुगाभये च वपुषां सौदामिनीसन्निभा ।
मुक्तादामविराजमानपृथुलोत्तं ङ्गस्तनोद्भासिनी ।
पायाद्वः कमला कटाक्षविभवैरानन्दयन्ती हरिम् ।३८
दशलक्षं जपेन्मंत्रं मंत्रविद्विजितेन्द्रियः ।
दशांशं जुहुयान्मंत्रान् मधुराक्तैः सरोरुहैः ।३६
श्रीपीठे पूजयेद्देवीमङ्गानि प्रथमं यजेत् ।
बलाकाद्यास्ततः पूज्या लोकेशांस्तिस्र।वृतीरपि ।४०
इति सम्पूजयेद्देवी संपदामालयोभवेत् ।
समुद्रगायां सरिति कण्ठमात्र जले स्थितः ।४१