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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 415 में से

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पृष्ठ 388

२
²तम आसीत्तमसा गूळ्हमग्रेऽ प्रकेतमसलिलं सर्वमा इदम् ।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं ³यदासीत्, तपसस्तन्महिनाऽ⁴जायतैकम् ॥१८॥
पहिले तम हुआ, वह तम से छुपा हुआ था, (उसमें) यह
सब (जगत् नाम रूपात्मक प्रपंच) लिंग रहित था, वह जल
(सलिल) नहीं था ।
जो था वह तुच्छ (माया) से ढक गया, उसने तप किया,
तप की महिमा से एकँ (पुरुष) उत्पन्न हुआ । १८.
⁵कामस्तदग्रे समवर्तताधि, ⁶मनसो⁷रेतः प्रथमं यदासीत् ।
सतोबंधुमसति निरविन्दन्, हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषाः ॥१९॥
उसने पहिले संवर्तन (जगत् की सृष्टि) के लिये कामनाँ
को । (संसार के रूप में वर्तमान होने को संवर्तन कहते हैं) ।
प्रथम जो हुआ वह (उसके) मनँ की रेतँस् शक्ति हुई ।
उस असत् में सत्ँ ने अपना बंधु साथी पाया, यह बात
बुद्धिमान् सर्वज्ञ ऋषियों ने जिज्ञासा पूर्वक जानी । १९.
२ यह माया परा शक्ति ह्रीँ का रूप है, ३ यह सदाख्य तत्व श्रीँ
का स्वरूप है, ४ यह ईश्वर का ऐँ स्वरूप है, ५ यह भी ईश्वर
का क्लीँ रूप है, ६ सत् मन शुद्ध विद्या का रूप है, ७ असत्
रेतस् अशुद्ध विद्या का रूप है ।