सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा
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तिरश्चीनो विततोरश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरिस्विदासीत् ।
रेतोधा आसन् महिमान आसन् त्स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ॥
॥२०॥
तिरछी फैलती हुई उनकी किरणें नीचे की ओर फैलीं या
ऊपर की ओर, वे शक्ति धारण किये हुए थीं, बडे विस्तार वाली
थीं, और अपने ही आधार पर दूर तक फैली हुई थीं । २०.
को अद्धावेद क इह प्रवोचत् कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः ।
अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥२१॥
निश्चय यह किसने जाना ? किसने यहां कहा, कि कहां
से आई, कहां से यह सृष्टि हुई ? देवता तो इसके बनने के
पीछे के हैं । इसलिये किसने जाना कि कहां से हुई ? २१.
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव, यदि वा दधे यदि वा न ।
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अंग वेद यदि वा न वेद ॥२२॥
यह सृष्टि जहां से हुई, उसको धारण किया हुआ है या
नहीं । यह बात इसका जो अध्यक्ष परमाकाश है अरे ! वह ही
जानता है, अथवा यदि नहीं जानता (तो दूसरा कौन जान
सकता है, इसलिये वह ही जानता है) । २२.
नोट:—बीज मंत्रों का उत्पत्ति क्रम जो यहां दिखाया गया
है, वह योग मार्ग का क्रम है, देखें योगशिखोपनिषद