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सर्वकोश
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 415 में से

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पृष्ठ 387

परिशिष्ट (१)
ऋग्वेदीयं नासदासीय सूक्तम् ।
अष्टक ८, अ० ७, मं० १०, सू. १२९
परमेष्ठी प्रजापति : ऋषिः, त्रिष्टुभ् छन्दः परमात्मा देवता !
नासदासीन्नोसदासीत्तदानीं, नासीद्रजोनो व्योमा परोयत् ।
किमावरीवः कुहःकस्य शर्मन्नम्भः, किमासीद्गहनं गभीरम् ॥१६॥
अर्थ—तब न असत् था, न सत् था, रज नहीं था और
जो पराकाश हैं वह भी न था, क्या कोई आवरण था, (जैसे)
कुहरा या अंधकार ? किसकी प्रधानता थी, जल की ? क्या था ?
गहन गभीर था । (१६).
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि, न रात्र्या अह आसीत्प्रकेतः ।
आनीदवातं स्वधयातदेकं, तस्माद्धान्यन्न¹ परः किंचनाऽऽस ॥१७॥
न मृत्यु थी न अमृत था, रात्री और दिन के चिन्ह भी
नहीं थे, वह बिना वायु प्राण लेता था, वह अकेला अपनी
महिमा से पूर्ण था, और निश्चय उससे अन्य दूसरा कुछ
न था । (१७)
१ यह परं ब्रह्म ॐ का स्वरूप है ।