सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबौद्ध पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग ४०५
इसे ही धर्म का द्वितीय फल भी कहते हैं। उस लोक से दुःख का अन्त करने के
लिए एक ही बार लौटने वाले को सकृदागामी कहते हैं। तीन संयोजनों को क्षीण
करके राग, द्वेष, मोह को क्षीण करने वाला सकृदागामी होता है।
अनागामी—
'स कामधातोः समतिक्रमाय पार्ष्णिग्रहांस्तानभिभूय शत्रून् ।
योगादनागामिफलं प्रपद्य द्वारीव निर्वाणपुरस्य तस्थौ ॥'
—सौ० न० १७।४१
अनागामिफल तीसरा फल है। यह प्राप्त होने पर उस लोक से लौटना नहीं
पड़ता है।
विमोक्षसुख —
'मूलान्यथ त्रीण्यशुभस्य वीरस्त्रिभिर्विमोक्षायतनैश्चकर्त्त ।
चमूमुखस्थान् धृतकार्मुकांस्त्रीन्नरी निवारिस्त्रिभिरायसाग्रैः ॥'
—सौ० न० १७।४०
विमोक्ष सुख तीन हैं—शून्यता, अनिमित्त, अप्रणिहित। (—द्रष्टव्य, अ० को०
८।२५ तथा बुद्धचर्या, पाराजिका ४, पृ० ३२१।)
अर्हत्—
'ध्यानं च निश्रित्य ततश्चतुर्थमर्हत्त्वलाभाय मतिं चकार ।
सन्धाय मित्रं बलवन्तमार्यं राजेव देशानजितान् जिगीषुः ॥'
—सौ० न० १७।५६
धार्मिक मार्ग जिसका अवशिष्ट न हो, शोक-रहित, बाधा-विहीन, प्रबन्धनशून्य,
संताप-रहित, शान्त, यथार्थ ज्ञानी व्यक्ति ही अर्हत् कहलाता है।
आहार—'चतुर्विधे नैकविधप्रसङ्गे यतोऽहमाहारविधावसक्तः ।' —सौ० न० १८।१८
आहार चार तरह के हैं—१. कवलीकार ( स्थूल एवं सूक्ष्म ), २. स्पर्श—
( इन्द्रिय, विषय और विज्ञान के संयोग से उत्पन्न होने वाला ), ३. मनस्संचेतना
( मानसिक कर्म, विचार ), ४. विज्ञान ('विज्ञानस्कन्ध ), द्रष्टव्य—अभिधर्म-
कोश ३।३८।
भव—'विमुक्तोऽस्मि ततो भवेभ्यः ।' —सौ० न० १८।१८
भव तीन हैं—रूप, अरूप और काम।
मिथ्याज्ञान—'मिथ्याङ्गनागांश्चेति ।' —सौ० न० १७।२५
मिथ्याज्ञान चार हैं—१. विपर्यय, २. विकल्प, ३. निद्रा और ४. स्मृति।
पञ्चस्कन्ध—'स्कन्धांश्च रूपप्रभृतीन् ।' —सौ० न० १८।१५
पञ्चस्कन्ध हैं—१. रूप, २. वेदना, ३. संज्ञा, ४. संस्कार और ५. विज्ञान।
धातु—अभिधर्मकोश के अनुसार धातुएं छः हैं—पृथ्वी, आप्, तेज, वायु, आकाश
और विज्ञान।