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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 496 में से

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पृष्ठ 458

४०४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
पाँच कांटे-१. शास्ता के प्रति अश्रद्धा, २. भिक्षु-धर्म के प्रति विचिकित्सा, ३.
संघ के प्रति विचिकित्सा, ४. बौद्ध-शिक्षा के प्रति उपेक्षा, ५. सद्ब्रह्मचारियों के प्रति
कुभावना । ( विशेष के लिए द्रष्टव्य--सत्तिपट्ठानसुत्त--मज्झिमनिकाय )
पाँच आर्यबल-श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा । ( -द्रष्ट० संगीति-
परियायसुत्त, दीर्घनि० )
बोधि-अङ्ग-स्मृति, धर्म, वीर्य, प्रीति, प्रश्रब्धि, समाधि, उपेक्षा ।
कुशल कर्म-पथ-कुशल कर्म-पथ दश हैं-
'इति कर्मणा दशविधेन परमकुशलेन भूरिणा ।
भ्रंशिनि शिथिलगुणोऽपि युगे विजहार तत्र मुनिसंश्रयाज्जनः॥'
-सौ० न० ३।३७
इन्हें दश सुकर्म भी कहते हैं-१. प्राणातिपात विरति ( अहिंसा ), २. अदत्ता-
दान विरति ( चोरी नहीं करना ), ३. काममिथ्याचार विरति ( व्यभिचार नहीं
करना ), ४. मृषावाद विरति ( असत्य भाषण नहीं करना ), ५. पिशुनवचन विरति
( चुगलखोरी नहीं करना ), ६. परुषवचन विरति ( कठोर बातें नहीं करना ), ७.
प्रलाप विरति ( बकवाद नहीं करना ), ८. अन अभिध्या ( लोभ नहीं. करना ),
९. अव्यापाद ( द्रोह नहीं करना ), १०. सम्यक् दृष्टि । डॉ० जोन्स्टन के अनुसार ३३
और ३४ के बीच का श्लोक लुप्त है, जिनमें दो सुकर्मों का वर्णन आया होगा ।
स्मृति-उपस्थान-
'स स्मृत्युपस्थानमयैः पृषत्कैः शत्रून् विपर्यासमयान् क्षणेन ।
दुःखस्य हेतूनंश्चतुरश्चतुर्भिः स्वैः स्वैः प्रचारायतनैर्ददार ॥'
-सौ० न० १७।२५
मन और देह की स्थिति से अवगत होकर उसके प्रति जागरूक रहना ही स्मृति-
उपस्थान है। ये पाँच हैं-१. कायानुपश्यना, २. वेदनानुपश्यना, ३. चित्तानुपश्यना,
४. धर्मानुपश्यना । ( विशेष के लिए द्रष्टव्य-सतिपट्ठानसुत । )
स्रोतापत्ति-
'अथात्मदृष्टिं सकलां विधूय चतुर्षु सत्येष्वकथङ्कथः सन् ।
विशुद्धशीलव्रतदृष्टधर्मा धर्मस्य पूर्वा फलभूमिमाप ॥'
-सौ० न० १७।२७
इसे धर्म का प्रथम फल भी कहा जाता है। प्रथम फल-स्रोत आपत्ति, निर्वाण
मार्ग पर आरूढ़ होना, तीन संयोजनों के क्षीण होने से प्रथम फल की प्राप्ति होती है।
सकृदागामी-
'स कामरागप्रतिघौ स्थिरात्मा तेनैव योगेन तनू चकार ।
कृत्वामहोरस्कतनुस्तनू तौ प्राप द्वितीयं फलमार्यधर्मे ॥'
-सौ० न० १७।३७