सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०६ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
दशबल—'सम्बुद्धं दशबलिनं भिषक्प्रधानम्।' —सौ० न० १७।७३
गौतम बुद्ध को दश विशिष्ट बल होने के कारण उन्हें दशबल कहा जाता है। वे
दशबल इस प्रकार हैं—
१. वे कारक को कारण, अकारक को अकारण रूप में जानते हैं।
२. वे भूत, भविष्य और वर्तमान के कृतकर्मों के विपाक को स्थान और हेतु के
साथ समझते हैं।
३. सब जगह जाने वाली राहों का उन्हें यथार्थ ज्ञान है।
४. अनेक ब्रह्माण्ड और धातुओं का उन्हें सही ज्ञान है।
५. विभिन्न विचारशील सत्त्वों को वे ठीक से पहचानते हैं।
६. दूसरे प्राणियों के इन्द्रियों की दुर्बलता और सबलता को वे ठीक से
पहचानते हैं।
७. विमोक्ष, ध्यान, समाधि; समापत्ति के संकेत परिशुद्धि और उत्थान को ठीक-
ठीक जानते हैं।
८. जन्म-जन्मान्तर की उन्हें स्मृति है।
९. अमानुषीय दिव्य दृष्टि से किसी भी प्राणी के जन्मान्तर की बातों से
परिचित हैं।
१०. आस्रवों के क्षय से आस्रव रहित चित्त और प्रज्ञा की विमुक्ति को इसी जन्म
में प्राप्त करके विहार करते हैं।
आस्रव—'दघात्यास्रवसङ्क्षयाय।' —सौ० न० १६।३
मन के मैल को बौद्ध धर्म में 'आस्रव' कहा गया है। ये चार आस्रव हैं—
१. कामास्रव, २. भवास्रव, ३. दृष्टास्रव और ४. अविद्यास्रव।
कामगुणसम्बन्धी राग कामास्रव हैं। रूप और अरूप भवों में उत्पन्न होने का
छन्दराग, ध्यान की इच्छा, शाश्वत दृष्टि, सहगत उत्पन्न राग और भवों के लिए
प्रार्थना भवास्रव हैं। बासठ प्रकार की मिथ्या दृष्टियां दृष्टास्रव हैं। दुःख, दुःख-समु-
दाय, दुःखनिरोध, दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपद्, पूर्वान्त, अपरान्त, पूर्वापरान्त तथा
प्रतीत्यसमुत्पाद की अज्ञानता को अविद्यास्रव कहते हैं। इन चारो आस्रवों से
मुक्त व्यक्ति ही 'अर्हत्' कहलाने का सच्चा अधिकारी होता है।
अभिज्ञा—'प्राप्नोत्यभिज्ञा नियमेन पञ्च।' —सौ० न० १६।१
अभिज्ञाएँ पाँच हैं—१. दिव्यचक्षु, २. दिव्यश्रोत्र, ३. परचित्तज्ञान, ४. पूर्व-
निवासानुस्मृति और ५. ऋद्धि।