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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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बौद्ध पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग ४०३
२. अनुत्पन्न कुशल कर्मों की संरचना, ३. उत्पन्न अकुशल कर्मों का विनाश करना और
४. उत्पन्न कुशल कर्मों का संरक्षण—सम्यक् व्यायाम है।
सम्यक् स्मृति—लोभ, मत्सर और ईर्ष्या को दूर हटाकर, मन, वचन और कर्म
से धर्म के प्रति सतत जागरूकता ही सम्यक् स्मृति है। कुशल धर्मों के प्रति स्मृति की
जागरूकता ही हित, अहित की पहचान कराती है। इसके प्रति सचेष्टता ही सम्यक्
स्मृति है।
सम्यक् समाधि—साधित चित्त की एकाग्रता, ऐन्द्रियिक विषयों के प्रति विरक्ति
ही सम्यक् समाधि है। कोप, मात्सर्य, प्रलाप, सन्देह और आसक्ति को छोड़कर बौद्ध-
भिक्षु करुणा-भाव से सभी संस्कारों का शमन कर, तृष्णा का विनाश कर निर्वाण की
दिशा में अग्रसर होता है, यही सम्यक् समाधि है। इस सम्यक् समाधि के अन्तर्गत
निम्नलिखित चार ध्यान हैं—
चार ध्यान—इन चारों ध्यानों का उल्लेख सौन्दरनन्द में इस प्रकार है—
१. 'कामैर्विविक्तं मलिनैश्च धर्मैर्वितर्कवच्चापि विचारवच्च।
विवेकजं प्रीतिसुखोपपन्नं ध्यानं ततः स प्रथमं प्रपेदे॥'—सौ० न० १७।४२
कामोपभोग और अमंगलकारी धर्मों से हीन, वितर्क और विचारयुक्त विवेको-
त्पन्न प्रीतिजन्य ध्यान को प्रथम ध्यान कहा गया है—
२. 'अथावितर्कं क्रमशोऽविचारमेकाग्रभावान्मनसः प्रसन्नम्।
समाधिजं प्रीतिसुखं द्वितीयं ध्यानं तदाध्यात्मशिवं स दध्यौ॥'
—सौ० न० १७।४७
अध्यात्म, वितर्क, विचारशून्य प्रीति एवं एकाग्रता नामक चार ध्यानाङ्गों से
युक्त द्वितीय ध्यान होता है—
३. 'प्रीतेर्विरागात् सुखमार्यजुष्टं कायेन विन्दन् अथ सम्प्रजानन्।
उपेक्षकः स स्मृतिमान् व्यहार्षीद् ध्यानं तृतीयः प्रतिलभ्य धीरः॥'
—सौ० न० १७।५०
इसमें पाँच ध्यानाङ्ग हैं—प्रीति से विरक्ति, आर्योचित सुख का ज्ञान, स्मृति,
सुख और समाधि।
४. 'अथ प्रहाणात् सुखदुःखयोश्च मनोविकारस्य च पूर्वमेव।
दध्यावुपेक्षास्मृतिमद्विशुद्धं ध्यानं तथा दुःखसुखं चतुर्थम्॥'
—सौ० न० १७।५४
सुख-दुःख की अनुभूति-शून्यता, उपेक्षा परिशुद्धि, स्मृति परिशुद्धि और समाधि—
इन चार अङ्गों से युक्त चतुर्थ ध्यान है।
चित्तकील—चेतःखिलानि या मन के काँटे ५ हैं—
'आर्यैर्बलैः पञ्चभिरेव पञ्च चेतःखिलान्यप्रतिमैर्बभञ्ज।
मिथ्याङ्गनागांश्च तथाङ्गनागैर्वनिर्दुधावाष्टभिरेव सोऽष्टौ॥'
—सौ० न० १७।२६