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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 496 में से

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पृष्ठ 456

४०२ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
है। इस मार्ग के आठ अङ्ग कहे गये हैं, वे आठ अङ्ग हैं—सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प,
सम्यक् वाक्, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और
सम्यक् समाधि। संक्षेप में इस मार्ग को शील, समाधि और प्रज्ञा भी कहा जाता
है। इसके तीन परिवर्त्त, बारह विकल्प और चार श्रेष्ठ विभाग हैं। ( द्रष्टव्य
सौन्दर०, सर्ग ३ श्लोक १२-१३ ) सांसारिक दुःख-निवृत्ति हेतु आठ मार्ग इस
प्रकार हैं—
१. सम्यक् दृष्टि : आर्यसत्य का पारस्परिक ज्ञान ।
२. सम्यक् संकल्प : विषयोपभोग के प्रति विरक्ति का दृढ़निश्चय ।
३. सम्यक् वाक्य : असत्य वचन का त्याग एवं सत्य का संयमन ।
४. सम्यक् कर्मान्त : सत्कर्म का सदाचार में परिवर्त्तन ।
५. सम्यक् आजीव : वृत्ति की निर्मलता ।
६. सम्यक् व्यायाम : अपकर्म का त्याग और सत्कर्म के प्रति सदुद्योग ।
७. सम्यक् स्मृति : आन्तरिक शुचिता ।
८. सम्यक् समाधि : चित्त की निश्चित एकाग्रता ।
सम्यक् दृष्टि—अष्टांगिक आर्यमार्ग की यह पहली सीढ़ी है। किसी भी वस्तु को
उसे उसके यथार्थ रूप की सही जानकारी प्राप्त कराना ही इसका प्रथम उद्देश्य है।
'सर्वं दुःखमयं जगत्' यह सारी सृष्टि ही दुःखमय है। प्राणियों के दुःख का कारण
उसकी तृष्णा है। तृणा से मुक्ति का मार्गान्वेषण तथा इसका यथार्थ परिवर्शन ही
सम्यक् दृष्टि है।
सम्यक् संकल्प—राग, द्वेष, हिंसा, प्रतिहिंसा से मुक्त होकर त्यागपूर्ण जीवन में
सद्‌विचार एवं सही चिन्तन की दिशा में दृढ़ निश्चय को सम्यक् संकल्प कहा
गया है।
सम्यक् वाक्—असत्य, अपलाप, प्रलाप, पैशून्य, बकवास से विरत होकर यथार्थ,
मृदु और मितवचन को सम्यक् वाक् कहा गया है।
सम्यक् कर्मान्त—कर्मफल ही व्यक्तित्व का आधार है। अपकर्म का फल दुःखद
और सत्कर्म का परिणाम सुखद होता है। अतः विवेक के माध्यम से छनकर आने-
वाला चिन्तन मानवीय कर्म की आधारशिला है। बौद्धधर्म में इसे ही सम्यक् कर्मान्त
कहा गया है।
सम्यक् आजीव—जीवन के लिए आजीविका का महत्त्व है, परन्तु आजीविका
ही जीवन नहीं हो सकती। अतः आजीविका का आधार सदाचरण के माध्यम से होना
चाहिए—'हतो वृत्ति हतो नरः'। अतः प्रयासपूर्वक सद्वृत्ति को ही अपनी आजी-
विका का आधार बनाना चाहिए। यही बौद्धों का सम्यक् आजीव है।
सम्यक् व्यायाम——यहाँ व्यायाम शब्द कुशल उद्योगपरक है। सन्मार्ग पर
चलकर सद्धर्म की प्राप्ति हेतु सदुद्योग को सम्यक् व्यायाम कहा गया है। इसे बौद्धों
ने चार खण्डों में विभक्त किया है—१. अनुत्पन्न और अकुशल कार्यों से कतराना,