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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 496 में से

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पृष्ठ 455

परिशिष्ट ( क )
सौन्दरनन्दमहाकाव्यगत बौद्ध पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग
आर्यसत्य—'अभिधर्मकोश' के भाष्यकार व सुबन्धु ने आर्यसत्य को निम्नरूपेण
परिभाषित किया है—
'ऊर्णापक्ष्म यथैव हि करतलं संस्थ्यं न वेद्यते पुम्भिः
अक्षिगतन्तु तथैव हि जनयत्यरतिं च पीडां च ।
करतलसदृशो बालो न वेत्ति संस्कारदुःखापक्ष्म
अक्षिसदृशस्तु विद्वांसो नैवोद्वेज्यते गाढम् ॥'
ये आर्यसत्य चार तरह के हैं—( १ ) दोष, ( २ ) दोषसमूह, ( ३ ) दोषनिरोध
और ( ४ ) दोषनिरोधगामिनी प्रतिपद् । पुनः इन चारों की व्याख्या निम्नरूपेण की
गई है—
१. दोष आर्यसत्य—दुःख से सारी दुनियां भरी है। संसार के अणु-अणु में दुःख
व्याप्त है। जन्म, वार्द्धक्य, मरण, प्रियवियोग, अप्रियसमागम, अभिलषित वस्तु की
अप्राप्ति, सभी तो दुःखमूलक ही हैं। 'महाहत्थिपदं सुत्तम्' मज्झिमनिकाय में आर्य-
सत्य के इस दुःखरूप का पूर्ण विवरण मिलता है। तदनुसार मूल रूप से आसक्ति-
जन्य रूप, वेदना, संज्ञा प्रभृति पञ्चस्कन्ध भी तो दुःख ही है।
२. दोषसमूह—दोषसमूह ही दुःखसमुदय है, बौद्धदर्शन के अनुसार 'समुदय'
का अर्थ समूह नहीं 'कारण' है। किसी भी कार्य के मूल में कारण का होना आवश्यक
है। दुःख यदि कार्य है तो तृष्णा इसका कारण है। तृष्णा नन्दी और राग से अनुप्रेरित
होती है। संसार-चक्र के संचालन का कारण भी यही तृष्णा है। बौद्ध धर्म के अनु-
सार तृष्णा के तीन स्वरूप हैं—१. कामतृष्णा, २. भवतृष्णा, ३. विभवतृष्णा।
विषयोपभोग की कामना कामतृष्णा है। शाश्वत् दृष्टि को 'भव' कहा गया है
और अभिलषित कर्म की सम्पूर्ति की कामना ही पुनर्जन्म का कारण है। इसे ही
भवतृष्णा कहा गया है। उच्छेद-दृष्टि को विभवतृष्णा कहा गया है। मरणोपरान्त
जीवन का समस्त स्वरूप विनष्ट हो जाता है। इस दृष्टि के साथ उत्पन्न होने वाली
तृष्णा ही विभवतृष्णा है और यही दुःखसमुदय है।
३. दोष या दुःखनिरोध आर्यसत्य—दुःखोत्पत्ति के कारण का विनष्ट होना ही
दुःख-निरोध है। इस स्थिति में सर्वप्रथम तृष्णा का ही विनाश होता है। तृष्णा के
उपादान कारणों का विनाश होते ही जरा, जन्म और मृत्यु के भय का विनाश हो
जाता है। इस भय के विनाश होते ही निर्वाण मिल जाता है। राग, द्वेष और मोह के
विनाश का ही नाम मुक्ति है। बौद्ध धर्म का यह अन्तिम पड़ाव है।
४. दोष या दुःखनिरोधगामिनी प्रतिपद् आर्यसत्य—बौद्धसम्प्रदाय में प्रतिपद्
शब्द का अर्थ 'मार्ग' माना गया है। भूतमार्ग को निरोधगामिनी प्रतिपद् कहा गया